रविवार, जनवरी 07, 2018

अनुबंधित यादें

मुंडेर  के दोनों ओर
 धूप में फैला दिया है
तुम्हारी अचैतन्य ओर   
सीलनभरी यादों को  ,
ज़हन मे क्रमबद्ध
अभिलिखित है वो  
सिलसिले, जो
आतुर है पुनरारंभ को ।
मासूम से बच्चे की मानिंद
हुलस कर,  आ लगती हैं  
गले, कुछ उनींदी यादें ।  
जन्म-जन्मांतर तक
अनुबंधित है
तुम्हारी

यादें.....

"विक्रम"

रविवार, अक्तूबर 15, 2017

दर-ब-दर

बालिश्त दर बालिश्त
गुजरती उम्र,
गिनती रही पोरों
पे वो पड़ाव , जो
बदलते रहे मायने
ज़िंदगी के ,
यादों की पुनरावृतियां
लाती रही सुनामीयां,  
बस यूँ कटता रहा
उबाऊ सफर
अनिश्चितताओं
के संग
दर-ब-दर..... बदस्तूर....

"विक्रम"

रविवार, अक्तूबर 08, 2017

अतीत

वक़्त के घोड़े पे सवार,
अतीत को पहलू में दबा , 
भागता रहा वो ताउम्र, 
मगर....
यादों के नुकीले तीर,
भेदते रहे, उसके
जिस्म-ओ-जान को,
और नोचते रहे ,
ज़हन से चिपके
अतीत के उस
हर एक लम्हे को….
-ak
 
 
 
 

 

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