रविवार, अगस्त 07, 2011

बे-घर दिल



अरे यार दिल …
सुन तो जरा ……!
अरे ! रुक भी जा यार……!
सुन…! अरे ! …रुक तो जरा !
पागल …कहाँ तु इधर उधर भाग रहा है ?
थोङा सुस्ता ले… कब से जाग रहा है
में तो अब थक चुका हुँ
इसीलिए तो इधर रुका हुँ
मगर पता नही …
तु इतना कैसे भाग लेता है ? ……
अरे…! तु सुन भी रहा है कि नही… ?
तु कान खोल के सुन ले …
में अब और नही भाग सकता …
अरे आखिर में एक इन्सान हुं यार…
तुम्हारे जैसा कोइ दिल नही……
कभी कुछ पल कहीं ठहर और देख …
नदी, नाले,गावँ और ये शहर तो देख
बहुत अच्छा लगेगा …
सच्ची …
कसम से … ओहो !
अब फ़िर कहां खो गया …?
यार हद है……
जाने कैसा दिल मिला है… ?
मेरे भाई……सुन…!एक आखिरी बात…
में तेरे हाथ जोड़ता हुँ …। !
अब…
तु मुझे …
जीने दे
बस !


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"विक्रम" (07-Aug -2011 )



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