बुधवार, सितंबर 21, 2011

दारु एक दवाई है करती चोखो काज



दारु एक दवाई है करती चोखो काज !
आज भर भर बोतल पिवन बेठ्यो समाज !
ई दारू में रजवाड़ा गया और गया राजाओ का राज !


अब भी सुधर जाओ थे मत होवो बर्बाद !
गहनों बिक गयो गांठो बिक्ग्यो बिकगी जमी जायदाद !
एक रिपिया री पैदा कोनी क्यूँ हो रया बर्बाद !

घरां पेली पावना आता बान चाय पानी री मनवार कराता !
अब मेहमाना न बोतल प्याओ !
नहीं मिले तो दो चार थैली ल्याओ !

नहीं मिली तो इज्जत जावे !
खाली रोटी घालता शर्म सी आवे !

पाड़ोसी के फोजी आयो दो चार बोतल जरुर ल्याओ !
कह लुगाई बेगा ल्याओ पावना न तो कीया जिया ही पाओ !

दारु आपां थ्री एक्स ले स्यां रिपिया रोकड़ी १५० देस्या !
रिपिया जेब में घाल्या घरां सु खाता खाता चाल्या !

घरां सु ठेके पर आया बा कुणसी है थ्री एक्स दे रे भाया !
घरां पावना आया चोखी दे जे रे भाया !

बाबोसा अबार ही गाडी आई थैली आपां २०० गिरवाई !
रिपिया में था सुं नगदी में ले स्या जना माल चोखो ही दे स्या !
दो चार बोतला अंग्रेजी में आई बे था खातर ही रखवाई !
बोतल कन्टेसा री आई बाने काढ पकड़ाई !

थैली दो दे दे कलासी बां न घाल ले स्यूं निरवाली !
थैली पेट में एक गेरी आयां हु गी घनी देरी !
घरां घरवाली खड़ी उडीके कठे आता दिखे !
आज सगली काली हु ज्यासी अब कुन सी हालत में आ सी !
अब मुस्किल सी घरां पुग्या घर का स लाल ताता हुग्या !

ले बोतला घरां पुग्या जना दो चार लुंका सागे हो ग्या !
आज पावना आया दिखे जना ही लुंका मन उडीके !
दो चार पेग मिल ज्य़ासी जना आज को काम बन ज्यासी !
अब बोतल अंग्रेजी री आई बोतल बाजोटा पर सजाई !

भायो गिलास कांच को ल्यायो लोटो पानी को पकडायो !
दारु गिलासा में घाली जतान प्लेट पापड की आली !
प्याला चाले है चोखा घरवाली बैठ गी है झरोखा !
अब सगा सगा करे है बात पीता पीता ढलगी रात !
अंग्रेजी दारु खत्म होगी अब खोल दी है थैली !


डाकिवाड़ो सूझ गयो आ ने आ शान कियां रेली !
टाबर फिरे आगे आगे कँवर सा रोटी कणा सी मांगे !
रोटी आधी रात मंगवाई बा भी ऊपर छात पर आई !
थाल बाजोटा पर आयो थाल ने चोखो घनो सजायो !
म्हारे घरां बटेऊ आया भोजन खीर खांड का बनाया !
फुलकी दूपडती बनवाई घी घाल र गल्घच करवाई !

सान्ग्र्या को रायतो बनायो टीटा को अचार !
अब पीकर हो गया बावला खानों गयो बेकार !

अब सगा गास्या दिरावे बेरियाँ ने मुंडा नजर न आवे !
सगा सगा आपस में बतलावे बात बा री समझ नही आवे !
अब रोटी जीमन रो होश नही है खानों निचे ढुल रियो है !
पीकर मतवाला बन गया है अन्न देव कियां रूस रिया है !

कुं विजेंद्र शेखावत (सिंहासन)

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4 टिप्‍पणियां:

  1. दारू है ही खराब इसने समाज को नुकसान ही पहुचाया है, यह रचना अच्छी है सुनील कुमार

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