रविवार, सितंबर 11, 2011

Lifestyle बनाम जीवनचर्या




अक्सर शहर के लोग गाँव वालो को हिकारत की नजर से देखते हैं और उनको गवार समझते हैं।  कुछ समझदार शहर वाले तरस खाने वाले अंदाज में उनसे बात करते हैं गाँव के लोगो को आभाव में जीवनयापन करना पसंद। है वो बेकार के तामझाम को अपने जीवन का हिस्सा बनाकर अपनी शांति में खलल डालना पसंद नहीं करतेमगर शहर के लोग कभी समझोता नहीं करते दिन रात ऐशोआराम  के बहाने तलाशने वाले चैन की नींद को तरस जाते हैं |

 

बड़े गाँव में ४०० से ५०० तक परिवार रहते हैं और वो हर एक सदस्य के बारे में खबर रखते हैं।  और एक दुसरे के सुख दुःख में  हर वक़्त तत्पर रहते हैं आज शहरों में बगल वाले मकान में कोन  रहता है।  पता नहीं अकेले रहने वाले बुजर्ग घरो में ही दफ़न हो जाते हैं।  बरसो बाद कोई आता है तो उनका कंकाल ही मिलता है। बच्चे  आज कल माँ-बाप को अकेला छोड़ विदेश चले जाते हैं , और बड़े बुजर्ग उनका इन्तजार करते करते दुनिया छोड़ देते हैं।  किस काम का ऐसा जीवन और एसोआराम ? अपने शरीर को आराम देना ही सच्चा सुख नहीं कभी अपनी आत्मा ,अपने दिल और दिमाग को भी उस  परमसुख की अनुभूति होने दो जिसका वो हक़दार है| आज में जहा रहता हूँ उसी अपार्टमेन्ट में 5 और परिवार रहते हैं , सभी के आने जाने का रास्ता एक ही है मगर बरसों गुजर जाते है एक दुसरे को देखे हुए बरसों बाद कभी आते जाते हलके से हाय हैलो या एक दुसरे की तरफ मुस्कराभर देते हैं।  इसके सिवा कोई सम्बन्ध नहीं है गावों में इसके विपरीत है , आप किसी को एक दिन ना देखे तो पूछने लगते है "वो आज कल दिखाई नहीं दे रहा" जब तक किसी से मिलकर दो चार घंटे बिता नहीं लेते चैन नहीं आता।  


शहर के लोगो के साथ एक बात और भी है और वो है समय का आभाव  हफ्ते में ६ दिन तो सुबह से रात होने तक घर चलाने के जुगाड़ में  लगे रहते हैं। छुट्टी के दिन लम्बे समय से बकाया कामों का निपटारा  कभी भूले भटके कम से छुट्टी ले भी ले तो बेचारे को १० कम निपटने  होते हैं , जैसे बिजली का बिल , गेस की बुकिंग , बच्चो के फ़ीस , राशन ,पानी,शोपिंग आदि  आदि।

 
मगर गाँव में लोगो की ऐश ही ऐश है  सही मायने में एक सही जीवन वो ही जी रहे हैं , मगर पता नहीं शहर वाले उनको "बेचारा" क्यों समझते हैं ? मगर शहर के लोगो के कुछ खास दोस्त भी है जो  अक्सर जीवनभर उनके साथ रहते हैं जैसे दिल, किडनी, रक्तचाप, मधुमेह की बीमारी।  गाँव के लोगो में बहुत कम देखने को मिलते हैं ये अनचाहे दोस्त, क्योंकि गाँव के लोग मेहनत ही इतनी करते हैं की ये अनचाहे दोस्त टिक ही नहीं पाते उनके साथ ।

आप सोचिये कहाँ रहना पसंद करेंगे ?
 




"विक्रम"

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2 टिप्‍पणियां:

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