बुधवार, नवंबर 23, 2011

पिता



          पिता ,
         अपनी जड़ों को
         जमीन के सिने में
         पेवस्त कर बनाता है घरोंदा ,
         ताकि ,
         बचा रहे आँधियों से और ,
         सुरक्षित रहे ज़माने की
         बुरी नजर से
         और....
 



जूझता है ताउम्र ,
जीवन के उतार चढ़ाव से,
मां संग घर के रखरखाव में,
और.... ,
लड़ता है ताउम्र,
करता है खबरदार ! वो मेरे बच्चे हैं ,
दुनिया के बच्चों से बहुत अच्छे हैं ,
और..... ,
सर पर हाथ घुमाकर ...
बताता है जीने के उपाय
पलट पलटकर ,
अपने अनुभव की किताबें ,
जो खरीदी थी कुछ खट्टे मिट्ठे
अनुभवों के बदले ,
जिन्दगी से


कहता है ताउम्र,
सुनो बेटे ! ये दुनिया बड़ी बेरहम है ,
कल तुम अकेले हो ,आज भर को हम है,


और....

 
फिर.. ,
पास बैठाकर , सर पर हाथ घुमाकर ...
बताता है जीने के उपाय ,
पलट पलटकर ,
अपने अनुभव की किताबें ,
जो खरीदी थी कुछ खट्टे मिट्ठे

अनुभवों के बदले , जिन्दगी से .

"विक्रम"

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3 टिप्‍पणियां:

  1. bahut badiya likhi h aapne
    sir ji

    kabhi aap mere blog par bhi padhariye
    http://rohitasghorela.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं

  2. ♥*♥



    प्रिय बंधुवर विक्रम शेखावत जी
    सस्नेहाभिवादन !

    सुनो बेटे !
    …कल तुम अकेले हो …
    आज भर को हम हैं …

    बहुत मर्मस्पर्शी …
    सबके साथ यही होता है भाई !

    हार्दिक मंगलकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

    उत्तर देंहटाएं

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