सोमवार, दिसंबर 31, 2012

द्रोपदी

क्षितिज की
खोहों तक
पसरा सन्नाटा और
शाखाओं पर बैठे 
शोकाकुल पक्षी,
देकर  उलाहना
भौर की लालिमा को ,
को बता रहे हैं
बीती  रात
का वो स्याह सच ,
और दिखा रहे है
इशारों से
धरा का  वो
सलवटी हिस्सा
जिस पर मिलकर ,
दुशासनों ने
जी-भरकर ,
नोचा-खसोटा और
फेंक दिया जूठन सा
एक द्रोपदी को , मगर
सुनकर उसका 
कारुणिक क्रंदन
नहीं आया कहीं से
एक भी देवकीनंदन

-विक्रम

द्रोपदी

क्षितिज की
खोहों तक
पसरा सन्नाटा और
शाखाओं पर बैठे 
शोकाकुल पक्षी,
देकर  उलाहना
भौर की लालिमा को ,
को बता रहे हैं
बीती  रात
का वो स्याह सच ,
और दिखा रहे है
इशारों से
धरा का  वो
सलवटी हिस्सा
जिस पर मिलकर ,
दुशासनों ने
जी-भरकर ,
नोचा-खसोटा और
फेंक दिया जूठन सा
एक द्रोपदी को , मगर
सुनकर उसका 
कारुणिक क्रंदन
नहीं आया कहीं से
एक भी देवकीनंदन

-विक्रम

शनिवार, दिसंबर 15, 2012

तनहा सा मकान

सूनी-सी  पगडण्डी के
दुसरे  छोर पर ,
वो  तनहा  सा मकान
खड़ा है संजोये अतीत के
कुछ हसीन लम्हे,
निस्तेज, निस्तब्ध ,सुनसान !
उसकी बूढी दीवारों पे
हरी काली सिवार ,
लिपटी है लिए,
मिलन बिछोह के निशान .
टूटकर झूलता वो दरवाजा ,
किसी ने थामकर जिसे ,
गुजारे थे इन्तजार के
वो बोझिल लम्हे तमाम
-विक्रम 

तनहा सा मकान

सूनी-सी  पगडण्डी के
दुसरे  छोर पर ,
वो  तनहा  सा मकान
खड़ा है संजोये अतीत के
कुछ हसीन लम्हे,
निस्तेज, निस्तब्ध ,सुनसान !
उसकी बूढी दीवारों पे
हरी काली सिवार ,
लिपटी है लिए,
मिलन बिछोह के निशान .
टूटकर झूलता वो दरवाजा ,
किसी ने थामकर जिसे ,
गुजारे थे इन्तजार के
वो बोझिल लम्हे तमाम
-विक्रम 

शनिवार, नवंबर 24, 2012

घुसपैठ


मेरे तन्हा मन पे
निरन्तर होती है
घुसपैठ
तेरी यादों की,
और देर तक
होता है संघर्ष
टूटे ख्वाबों
को लेकर  ,
आखिरकार
पानी ज्यों बहते है
अश्क दोनों के, 
क्यों ना हम
मिलकर एक
समझौता करें, की ,
उधर तुम ,
अपनी यादों को
बांध के रखो ,
और इधर में,
करता हूँ कोशिश
बहलाने की,
इस  मासूम
दिल को।   

"विक्रम"

घुसपैठ


मेरे तन्हा मन पे
निरन्तर होती है
घुसपैठ
तेरी यादों की,
और देर तक
होता है संघर्ष
टूटे ख्वाबों
को लेकर  ,
आखिरकार
पानी ज्यों बहते है
अश्क दोनों के, 
क्यों ना हम
मिलकर एक
समझौता करें, की ,
उधर तुम ,
अपनी यादों को
बांध के रखो ,
और इधर में,
करता हूँ कोशिश
बहलाने की,
इस  मासूम
दिल को।   

"विक्रम"

मंगलवार, नवंबर 13, 2012

मिठाई

अस्पताल के बरामदे मे अपनी बारी  के इंतजार मे खड़ा  बुधिया  बड़ी उत्सुकता से छोटी होती लाइन को देख रहा था। वह बार बार बैठकर अपनी थकान मिटाने की कोशिश कर रहा था। पिछले पाँच दिन से उसे कुछ भी काम नहीं मिला थे , जिसके चलते 3 दिन से घर मे चूल्हा भी नहीं जला।


 तुम !” , डॉक्टर ने उसे पहचानते हुये कहा। तुमने तो दो हफ्ते पहले खून दिया था ना? 

जी... हाँ डॉक्टर साहब, बुधिया ने दीनता से मुस्कराकर  हाथ जोड़ते हुये कहा ।

 लेकिन..... तुम इतनी जल्दी दुबारा खून नहीं दे सकते

 साहब , दया कीजिये , मेरा खून देना जरूरी है । मुझे पैसों की सख्त जरूरत  है। “ , बुधिया ने डॉक्टर के पैरों की तरफ हाथ बढ़ाते हुये कहा।


“नहीं” ,डॉक्टर ने बिना उसकी तरफ देखे इंकार ए सिर हिलाते हुये कहा।

“.....”,बुधिया  ने डॉक्टर के पैरों के पास बैठते हुये हाथ जोड़कर लगभग रो देने वाले अंदाज मे विनती की।  

 “लेकिन ऐसे इतनी जल्दी दुबारा खून देने से तुम्हें बहुत कमजोरी महसूस होगी, तुम्हारी सेहत के लिए अच्छा नहीं होगा। , डॉक्टर ने उसे समझाया ।

 

 “लेकिन मे ठीक हूँ , देखिये , बुधिया ने खड़े होकर अपना सीना आगे की तरफ निकालकर  ताकत दर्शाते हुये कहा ।
 

डॉक्टर ने नर्स की तरफ उसका खून लेने का इशारा किया । इशारा पाते  ही बुधिया मुस्कराता हुआ नर्स के पीछे पीछे चल पड़ा।
 

खून देने के बाद काउंटर से पैसे लेते वक़्त  बुधिया के चेहरे पे मुस्कान और गहरी हो गई और अस्पताल से बाहर आकार तेज़ कदमों से मिठाई की दुकान की तरफ बढ़ गया।  सुबह जब आस पड़ोस मे एक दूसरे के घरों मे दिवाली की मिठाइयों का आदान प्रदान हो रहा था तो उसके तीन से भूखे बच्चे ललचाई नजरों से उन्हे देख रहे थे ।  

/AK    

 

 


    
 

 


-विक्रम  
 

मिठाई

अस्पताल के बरामदे मे अपनी बारी  के इंतजार मे खड़ा  बुधिया  बड़ी उत्सुकता से छोटी होती लाइन को देख रहा था। वह बार बार बैठकर अपनी थकान मिटाने की कोशिश कर रहा था। पिछले पाँच दिन से उसे कुछ भी काम नहीं मिला थे , जिसके चलते 3 दिन से घर मे चूल्हा भी नहीं जला।


 तुम !” , डॉक्टर ने उसे पहचानते हुये कहा। तुमने तो दो हफ्ते पहले खून दिया था ना? 

जी... हाँ डॉक्टर साहब, बुधिया ने दीनता से मुस्कराकर  हाथ जोड़ते हुये कहा ।

 लेकिन..... तुम इतनी जल्दी दुबारा खून नहीं दे सकते

 साहब , दया कीजिये , मेरा खून देना जरूरी है । मुझे पैसों की सख्त जरूरत  है। “ , बुधिया ने डॉक्टर के पैरों की तरफ हाथ बढ़ाते हुये कहा।


“नहीं” ,डॉक्टर ने बिना उसकी तरफ देखे इंकार ए सिर हिलाते हुये कहा।

“.....”,बुधिया  ने डॉक्टर के पैरों के पास बैठते हुये हाथ जोड़कर लगभग रो देने वाले अंदाज मे विनती की।  

 “लेकिन ऐसे इतनी जल्दी दुबारा खून देने से तुम्हें बहुत कमजोरी महसूस होगी, तुम्हारी सेहत के लिए अच्छा नहीं होगा। , डॉक्टर ने उसे समझाया ।

 

 “लेकिन मे ठीक हूँ , देखिये , बुधिया ने खड़े होकर अपना सीना आगे की तरफ निकालकर  ताकत दर्शाते हुये कहा ।
 

डॉक्टर ने नर्स की तरफ उसका खून लेने का इशारा किया । इशारा पाते  ही बुधिया मुस्कराता हुआ नर्स के पीछे पीछे चल पड़ा।
 

खून देने के बाद काउंटर से पैसे लेते वक़्त  बुधिया के चेहरे पे मुस्कान और गहरी हो गई और अस्पताल से बाहर आकार तेज़ कदमों से मिठाई की दुकान की तरफ बढ़ गया।  सुबह जब आस पड़ोस मे एक दूसरे के घरों मे दिवाली की मिठाइयों का आदान प्रदान हो रहा था तो उसके तीन से भूखे बच्चे ललचाई नजरों से उन्हे देख रहे थे ।  

/AK    

 

 


    
 

 


-विक्रम  
 

सोमवार, नवंबर 05, 2012

बेटी



“तूँ किससे शादी करेगी?” , नन्हें रिंकू ने अपने साथ झूले पे बैठी निक्की से पूछा।
“मेँ तो तुझसे ही शादी करूंगी”, मासूम निक्की ने बेपरवाही से जवाब दिया।

नन्हा रिंकू उसका जवाब सुनकर खामोश हो गया। दोनों बच्चे पार्क मे बने झूले पे झूल रहे थे। आज सामने वाले शर्मा जी के लड़की की शादी थी। चारों तरफ बहुत गहमा गहमी थी। बारात आने के बाद बैंड बजे का शोर शराबा लगातार तेज़ होता जा रहा था।

“आज रश्मि दीदी खेलने  क्यों नहीं आई ?”, रिंकू ने निक्की से पूछा।

“आज रश्मि दीदी की शादी है ना , इसीलिए नहीं आई ”, निक्की ने  कहा।

क्या शादी के बाद वो हमारे साथ खेलने आएंगी ?”

“बुद्दू !, शादी के बाद वो दूर चली जाएंगी”

“कहाँ ?”

“अपने दूल्हे के साथ”, निक्की का जवाब सुनकर नन्हा रिंकू खामोश हो गया।

लेकिन मेँ तो तुम्हारे साथ दूर नहीं जा पाऊँगा, मम्मी जाने नहीं देगी”,कुछ देर की खामोशी के  बाद रिंकू ने कहा। 

“लेकिन तब तक तो तुम बड़े हो जाओगे और बड़े होने के बाद मम्मी पापा कहीं भी आने जाने को मना नहीं करते। “

नन्हा रिंकू फिर से निक्की के तर्क पर खामोश हो गया।

“शर्मा जी ने अपनी इकलोती बेटी की शादी मे अपना प्रोविडेंट फंड और जमा पुंजी का सब पैसा लगा दिया थादूल्हा अजय डॉक्टर था। शर्मा जी की लड़की रश्मि एक स्कूल मेँ पढ़ाती थी। शर्माजी काफी धार्मिक पृवर्ती के इंसान थे इसीलिए कॉलोनी मे उनकी अच्छी प्रतिष्ठा थी।

दिनभर शादी के कार्यकर्मो मे व्यस्त रहे शर्माजी बेटी की विदाई के वक्त बच्चे की तरह सुबक पड़े। रश्मि उनकी बेटी ही नहीं बल्कि एक दोस्त जैसी थी। जब रश्मि 5 साल की थी तभी उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई थी। परिवार वालों के लाख समझाने पर भी शर्माजी ने दूसरी शादी नहीं की। उन्होने रश्मि को माँ बनकर पाला था। जवान होने पर रश्मि घर की ज़िम्मेदारी मे पिता का हाथ बंटाने लगी। वो अपने पिता का भी पूरा ख्याल रखती थी। वो एक माँ की तरह अपने पिता की देखभाल करती थी। जब कब शर्माजी काम की अधिकता के चलते वक़्त पे खाना नहीं खा पाते तो उन्हे रश्मि के गुस्से का सामना करना पड़ता। रश्मि के डांट-डपट मेँ शर्माजी को कभी अपनी स्वर्गवासी पत्नी तो कभी अपनी माँ की झलक मिलती , जब कभी वक़्त पे खाना ना खाने पर उनकी माँ या उनकी पत्नी उन्हे डांटती थी।

भारी मन से बाप-बेटी  समाज और प्रकृति के बनाए नियम के तहत एक दूसरे से बिछड़ गए। एक बाप के घर को वीरान करके बारात उसी बैंड बाजे के साथ चली गई जिस बैंड बाजे के साथ कुछ देर पहले खुशियाँ लेकर आई थी।

शादी के दो माह बाद रश्मि पिता से मिलने आई । हरदम चहकने वाली रश्मि अब काफी खोई खोई सी लग रही थी। पिता के लाख पूछने पर भी उसने बस ये कहकर बात टाल दी की सफर की थकावट की वजह से ऐसा हैं। एक दिन ठहरकर रश्मि वापिस अपनी ससुराल चली गई , मगर बूढ़े पिता ने बेटी की आंखो मे छुपे दर्द को पढ़ लिया था।

दो दिन बाद फिर से रश्मि आई तो शर्मा जी को एहसास हो गया की कुछ गड़बड़ है। उन्होने बेटी से पूछा मगर रश्मि फिर टाल गई और बोली को स्कूल मे हिसाब के कुछ पैसे बाकी थे वो लेने आई हूँ। शर्मा जी बेटी की आवाज मे छुपे दर्द को अनुभव कर रहे थे।  

“ठीक है कल मेँ भी चलता हूँ तूमहरे साथ तुम्हारे स्कूल, अभी थोड़ा बाजार से सामान लेता आऊं”, कहकर शर्माजी साइकिल लेकर बाहर निकल गए।

वापिस आए तो उनकी लाड़ली उन्हे सदा के लिए छोड़कर जा चुकी थी। रश्मि का शरीर पंखे से लटक रहा था। नीचे बिस्तर पर स्टैम्प पेपर के साथ सुसाईट नोट पड़ा था।  ससुराल वाले रश्मि पे लगातार दवाब बना रहे थे की अपने पिता का मकान अजय के नाम करे ताकि अजय वहाँ डिस्पेन्सरी खोल सके।

पूरी कॉलोनी मे शोक की लहर दौड़ गई। जिसने भी सुना वो शर्मा जी के घर की तरफ दौड़ पड़ा।

रिंकू आज झूले पे अकेला ही था। निक्की ने उसे  कह दिया की वो अब लड़को के साथ नहीं खेलेगी।

विक्रम”


बेटी



“तूँ किससे शादी करेगी?” , नन्हें रिंकू ने अपने साथ झूले पे बैठी निक्की से पूछा।
“मेँ तो तुझसे ही शादी करूंगी”, मासूम निक्की ने बेपरवाही से जवाब दिया।

नन्हा रिंकू उसका जवाब सुनकर खामोश हो गया। दोनों बच्चे पार्क मे बने झूले पे झूल रहे थे। आज सामने वाले शर्मा जी के लड़की की शादी थी। चारों तरफ बहुत गहमा गहमी थी। बारात आने के बाद बैंड बजे का शोर शराबा लगातार तेज़ होता जा रहा था।

“आज रश्मि दीदी खेलने  क्यों नहीं आई ?”, रिंकू ने निक्की से पूछा।

“आज रश्मि दीदी की शादी है ना , इसीलिए नहीं आई ”, निक्की ने  कहा।

क्या शादी के बाद वो हमारे साथ खेलने आएंगी ?”

“बुद्दू !, शादी के बाद वो दूर चली जाएंगी”

“कहाँ ?”

“अपने दूल्हे के साथ”, निक्की का जवाब सुनकर नन्हा रिंकू खामोश हो गया।

लेकिन मेँ तो तुम्हारे साथ दूर नहीं जा पाऊँगा, मम्मी जाने नहीं देगी”, कुछ देर की खामोशी के  बाद रिंकू ने कहा। 

“लेकिन तब तक तो तुम बड़े हो जाओगे और बड़े होने के बाद मम्मी पापा कहीं भी आने जाने को मना नहीं करते। “

नन्हा रिंकू फिर से निक्की के तर्क पर खामोश हो गया।

“शर्मा जी ने अपनी इकलोती बेटी की शादी मे अपना प्रोविडेंट फंड और जमा पुंजी का सब पैसा लगा दिया थादूल्हा अजय डॉक्टर था। शर्मा जी की लड़की रश्मि एक स्कूल मेँ पढ़ाती थी। शर्माजी काफी धार्मिक पृवर्ती के इंसान थे इसीलिए कॉलोनी मे उनकी अच्छी प्रतिष्ठा थी।

दिनभर शादी के कार्यकर्मो मे व्यस्त रहे शर्माजी बेटी की विदाई के वक्त बच्चे की तरह सुबक पड़े। रश्मि उनकी बेटी ही नहीं बल्कि एक दोस्त जैसी थी। जब रश्मि 5 साल की थी तभी उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई थी। परिवार वालों के लाख समझाने पर भी शर्माजी ने दूसरी शादी नहीं की। उन्होने रश्मि को माँ बनकर पाला था। जवान होने पर रश्मि घर की ज़िम्मेदारी मे पिता का हाथ बंटाने लगी। वो अपने पिता का भी पूरा ख्याल रखती थी। वो एक माँ की तरह अपने पिता की देखभाल करती थी। जब कब शर्माजी काम की अधिकता के चलते वक़्त पे खाना नहीं खा पाते तो उन्हे रश्मि के गुस्से का सामना करना पड़ता। रश्मि के डांट-डपट मेँ शर्माजी को कभी अपनी स्वर्गवासी पत्नी तो कभी अपनी माँ की झलक मिलती , जब कभी वक़्त पे खाना ना खाने पर उनकी माँ या उनकी पत्नी उन्हे डांटती थी।

भारी मन से बाप-बेटी  समाज और प्रकृति के बनाए नियम के तहत एक दूसरे से बिछड़ गए। एक बाप के घर को वीरान करके बारात उसी बैंड बाजे के साथ चली गई जिस बैंड बाजे के साथ कुछ देर पहले खुशियाँ लेकर आई थी।

शादी के दो माह बाद रश्मि पिता से मिलने आई । हरदम चहकने वाली रश्मि अब काफी खोई खोई सी लग रही थी। पिता के लाख पूछने पर भी उसने बस ये कहकर बात टाल दी की सफर की थकावट की वजह से ऐसा हैं। एक दिन ठहरकर रश्मि वापिस अपनी ससुराल चली गई , मगर बूढ़े पिता ने बेटी की आंखो मे छुपे दर्द को पढ़ लिया था।

दो दिन बाद फिर से रश्मि आई तो शर्मा जी को एहसास हो गया की कुछ गड़बड़ है। उन्होने बेटी से पूछा मगर रश्मि फिर टाल गई और बोली को स्कूल मे हिसाब के कुछ पैसे बाकी थे वो लेने आई हूँ। शर्मा जी बेटी की आवाज मे छुपे दर्द को अनुभव कर रहे थे।  

“ठीक है कल मेँ भी चलता हूँ तूमहरे साथ तुम्हारे स्कूल, अभी थोड़ा बाजार से सामान लेता आऊं”, कहकर शर्माजी साइकिल लेकर बाहर निकल गए।

वापिस आए तो उनकी लाड़ली उन्हे सदा के लिए छोड़कर जा चुकी थी। रश्मि का शरीर पंखे से लटक रहा था। नीचे बिस्तर पर स्टैम्प पेपर के साथ सुसाईट नोट पड़ा था।  ससुराल वाले रश्मि पे लगातार दवाब बना रहे थे की अपने पिता का मकान अजय के नाम करे ताकि अजय वहाँ डिस्पेन्सरी खोल सके।

पूरी कॉलोनी मे शोक की लहर दौड़ गई। जिसने भी सुना वो शर्मा जी के घर की तरफ दौड़ पड़ा।

रिंकू आज झूले पे अकेला ही था। निक्की ने उसे  कह दिया की वो अब लड़को के साथ नहीं खेलेगी।

विक्रम”


बुधवार, अक्तूबर 24, 2012

रेवती चाची



चित्र गूगल आभार 
रेवती चाची बीस साल की उम्र मे विधवा हो गई थी। पति की मौत के वक़्त वो पेट से थी। अपने से दस साल बड़े शराबी जगन से शादी होने के बाद उसका दो साल का वैवाहिक जीवन कष्टपूर्ण ही रहा। रोज रोज जगन का शराब पीकर घर आना और रेवती से मार पीट करना। घर के इसी घुटन भरे माहौल से परेशान होकर शादी के सालभर बाद जगन की माँ भी चल बसी थी। उसके पिता तो उसकी बाल्यवस्था  में ही भगवान को प्यारे हो गए थे।

माँ के लाड़-प्यार ने इकलौते जगन को जरूरत से ज्यादा आज़ादी दी थी जिसकी बदौलत बचपन से जिद्दी जगन जवानी मे कदम रखने से पहले ही शराबी बन चुका था। परिवार और मोहल्ले वालों के समझाने पर  जगन की माँ ने उसके फेरे करवा दिये, सोचा पैरों मे बेड़िया पड़ेंगी तो अक्ल ठिकाने आ जाएगी। अपनी  घर गृहस्थी की जिम्मेदारियाँ निभाने लगेगा तो शराब की आदत स्वत: छूट जाएगी।

शादी के बाद भी जगन की हरकतों मे बदलाव की गुंजाइस नजर नहीं आई और इसी कशमकश से परेशान होकर एक दिन उसकी माँ भी चुपके से भगवान के पास चली गई। रेवती का एक मात्र सहारा भी चला गया। दोनों सास बहू अपने बुरे वक़्तों को साझा कर लिया करती थी मगर अब तो सारे दुख रेवती को अकेले ही वहन करने होंगे।

घर में पैसे की तंगी आई तो रेवती ने सिलाई मशीन से अपना और अपने शराबी पति का भरण-पोषण करना शुरू किया। आधे से ज्यादा पैसे तो जगन की शराब मे ही चले जाते। कभी कभार बिना खाये ही गुजारा करना पड़ता। लेकिन उसे मार जरूर खानी पड़ती। कभी खाना न होने पर तो कभी खाना खाने के लिए कहने पर। अपने नसीब को कोसती वो इस इंतजार मे संघर्ष करती रही की सायद अच्छे दिन कभी तो आएंगे।

एक रात जगन घर नहीं आया ,किसी ने सुबह उसे बताया की जगन गाँव के बाहर चौराहे में पड़ा है और गाँव वाले उसको घेर कर खड़े हैं। वो तुरंत बताने वाले के साथ उस तरफ चल पड़ी। सामने से कुछ लोग जगन को कंधे पे उठाए ला रहे थे। गाँव की औरतों ने रेवती चाची को रोक लिया और उसको उसके घर में ले आई। जगन को घर के बाहर चबूतरे पर लिटा दिया। गाँव की औरते रेवती को पकड़ जगन के पास ले आई और उसके दोनों कलाइयों से चुड़ियाँ तोड़कर जगन पे डाल दी। अचानक हुये इस हादसे ने रेवती को हिलाकर रख दिया था।   

जगन के बरहवीं के कुछ दिन बाद रेवती के भाई उसको अपने साथ ले गए। मगर माँ के घर में स्वेन्दनाओं के पाँच साल गुजरने के बाद रेवती का बुरा वक़्त फिर उसके सामने आ खड़ा हुआ। उसकी माँ के देहांत के कुछ माह बाद ही घर का माहौल बदले लगा। वही भाभियाँ जो रेवती दीदी कहते नहीं थकती थी अब उस से किनारा करने लगी थी। अक्सर बात बात पे ताने मिलने लगे।  
थक हार कर अपने चार साल के बेटे विनोद को ले ससुराल मे आ गई। वो ससुराल जहां उसके सिवा उसका कोई नहीं था। अपने बंद पड़े मकान को साफ सुथरा करके वो जीवन से संघर्ष करने निश्चय कर  चुकी थी। अपनी बंद पड़ी सिलाई मशीन को हथियार बना वो कर्मयुद्ध को तैयार थी। अपनी माँ से दहेज स्वरूप मिली ये मशीन उसके जीवन यापन का एक मात्र सहारा थी।

बचपन से हमने रेवती चाची को संघर्ष करते ही देखा था। आज अपने बच्चे को पालने और लिखाने पढ़ाने की ज़िम्मेदारी निभा रही थी मगर चेहरे पे सिकन तक नहीं थी। जब भी हमारे घर आती थी उसका चार पाँच साल का बेटा विनोद उसके पल्लू से चिपका रहता था। वही उसके बुढ़ापे का एकमात्र सहारा था। विनोद कल को जवान होकर अपनी माँ की जिम्मेदारियाँ अपने कंधो पे उठा लेगा तो जीवन भर संघर्ष करती रेवती को आराम मिलेगा।  

वक़्त अपनी गति से गुजरता रहा। विनोद जवानी की देहलीज पे कदम रख चुका था। माँ की मेहनत रंग लाई और उसे एक कंपनी मे अच्छी पगार पे नौकरी भी मिल गई। रेवती चाची के दुखों का अंत हो गया था। वो अपनी खुशी को दोगुना करना चाहती थी। उसने विनोद की शादी करदी और घर में दुल्हन के आने से चहल पहल बढ़ गई थी। वो घर जो सुना सुना सा रहता था आज भरा भरा सा लग रहा था। रेवती चाची की मेहनत आखिर रंग लाई और उसने दुखों से संघर्ष कर खुशियों को हासिल किया।
विनोद की शादी के लगभग पाँच साल बाद दो दिन के लिए किसी कारणवश गाँव आया तो सोचा जाने से पहले रेवती चाची ने मिलता चलूँ। मैंने दरवाजे पे दस्तक दी तो रेवती चाची ने दरवाजा खोला, मुझे पहचानते हुये मेरे सिर पे हाथ फेरा और अंदर आने को कहा। घर के आँगन के बीचों बीच एक सिलाई मशीन रखी थी जिसके आस पास कपड़ों का ढेर पड़ा था।

“इस बार बहुत दिन बाद आए बेटे”, चाची ने पानी का गिलाश देते हुये कहाँ।
“हाँ चाची , बस ऐसे ही नहीं आ पाया “
“विनोद कहाँ है ?”, मैंने इधर उधर देखते हुये कहा।
“वो और बहू तो पिछले तीन साल से शहर में ही रहते हैं”, रेवती चाची ने मशीन चलाते हुये कहा।

कुछ देर की खामोशी के बाद में चाची को संघर्षरत छोड़कर चला आया।

   
"विक्रम"

रेवती चाची



चित्र गूगल आभार 
रेवती चाची बीस साल की उम्र मे विधवा हो गई थी। पति की मौत के वक़्त वो पेट से थी। अपने से दस साल बड़े शराबी जगन से शादी होने के बाद उसका दो साल का वैवाहिक जीवन कष्टपूर्ण ही रहा। रोज रोज जगन का शराब पीकर घर आना और रेवती से मार पीट करना। घर के इसी घुटन भरे माहौल से परेशान होकर शादी के सालभर बाद जगन की माँ भी चल बसी थी। उसके पिता तो उसकी बाल्यवस्था  में ही भगवान को प्यारे हो गए थे।

माँ के लाड़-प्यार ने इकलौते जगन को जरूरत से ज्यादा आज़ादी दी थी जिसकी बदौलत बचपन से जिद्दी जगन जवानी मे कदम रखने से पहले ही शराबी बन चुका था। परिवार और मोहल्ले वालों के समझाने पर  जगन की माँ ने उसके फेरे करवा दिये, सोचा पैरों मे बेड़िया पड़ेंगी तो अक्ल ठिकाने आ जाएगी। अपनी  घर गृहस्थी की जिम्मेदारियाँ निभाने लगेगा तो शराब की आदत स्वत: छूट जाएगी।

शादी के बाद भी जगन की हरकतों मे बदलाव की गुंजाइस नजर नहीं आई और इसी कशमकश से परेशान होकर एक दिन उसकी माँ भी चुपके से भगवान के पास चली गई। रेवती का एक मात्र सहारा भी चला गया। दोनों सास बहू अपने बुरे वक़्तों को साझा कर लिया करती थी मगर अब तो सारे दुख रेवती को अकेले ही वहन करने होंगे।

घर में पैसे की तंगी आई तो रेवती ने सिलाई मशीन से अपना और अपने शराबी पति का भरण-पोषण करना शुरू किया। आधे से ज्यादा पैसे तो जगन की शराब मे ही चले जाते। कभी कभार बिना खाये ही गुजारा करना पड़ता। लेकिन उसे मार जरूर खानी पड़ती। कभी खाना न होने पर तो कभी खाना खाने के लिए कहने पर। अपने नसीब को कोसती वो इस इंतजार मे संघर्ष करती रही की सायद अच्छे दिन कभी तो आएंगे।

एक रात जगन घर नहीं आया ,किसी ने सुबह उसे बताया की जगन गाँव के बाहर चौराहे में पड़ा है और गाँव वाले उसको घेर कर खड़े हैं। वो तुरंत बताने वाले के साथ उस तरफ चल पड़ी। सामने से कुछ लोग जगन को कंधे पे उठाए ला रहे थे। गाँव की औरतों ने रेवती चाची को रोक लिया और उसको उसके घर में ले आई। जगन को घर के बाहर चबूतरे पर लिटा दिया। गाँव की औरते रेवती को पकड़ जगन के पास ले आई और उसके दोनों कलाइयों से चुड़ियाँ तोड़कर जगन पे डाल दी। अचानक हुये इस हादसे ने रेवती को हिलाकर रख दिया था।   

जगन के बरहवीं के कुछ दिन बाद रेवती के भाई उसको अपने साथ ले गए। मगर माँ के घर में स्वेन्दनाओं के पाँच साल गुजरने के बाद रेवती का बुरा वक़्त फिर उसके सामने आ खड़ा हुआ। उसकी माँ के देहांत के कुछ माह बाद ही घर का माहौल बदले लगा। वही भाभियाँ जो रेवती दीदी कहते नहीं थकती थी अब उस से किनारा करने लगी थी। अक्सर बात बात पे ताने मिलने लगे।  
थक हार कर अपने चार साल के बेटे विनोद को ले ससुराल मे आ गई। वो ससुराल जहां उसके सिवा उसका कोई नहीं था। अपने बंद पड़े मकान को साफ सुथरा करके वो जीवन से संघर्ष करने निश्चय कर  चुकी थी। अपनी बंद पड़ी सिलाई मशीन को हथियार बना वो कर्मयुद्ध को तैयार थी। अपनी माँ से दहेज स्वरूप मिली ये मशीन उसके जीवन यापन का एक मात्र सहारा थी।

बचपन से हमने रेवती चाची को संघर्ष करते ही देखा था। आज अपने बच्चे को पालने और लिखाने पढ़ाने की ज़िम्मेदारी निभा रही थी मगर चेहरे पे सिकन तक नहीं थी। जब भी हमारे घर आती थी उसका चार पाँच साल का बेटा विनोद उसके पल्लू से चिपका रहता था। वही उसके बुढ़ापे का एकमात्र सहारा था। विनोद कल को जवान होकर अपनी माँ की जिम्मेदारियाँ अपने कंधो पे उठा लेगा तो जीवन भर संघर्ष करती रेवती को आराम मिलेगा।  

वक़्त अपनी गति से गुजरता रहा। विनोद जवानी की देहलीज पे कदम रख चुका था। माँ की मेहनत रंग लाई और उसे एक कंपनी मे अच्छी पगार पे नौकरी भी मिल गई। रेवती चाची के दुखों का अंत हो गया था। वो अपनी खुशी को दोगुना करना चाहती थी। उसने विनोद की शादी करदी और घर में दुल्हन के आने से चहल पहल बढ़ गई थी। वो घर जो सुना सुना सा रहता था आज भरा भरा सा लग रहा था। रेवती चाची की मेहनत आखिर रंग लाई और उसने दुखों से संघर्ष कर खुशियों को हासिल किया।
विनोद की शादी के लगभग पाँच साल बाद दो दिन के लिए किसी कारणवश गाँव आया तो सोचा जाने से पहले रेवती चाची ने मिलता चलूँ। मैंने दरवाजे पे दस्तक दी तो रेवती चाची ने दरवाजा खोला, मुझे पहचानते हुये मेरे सिर पे हाथ फेरा और अंदर आने को कहा। घर के आँगन के बीचों बीच एक सिलाई मशीन रखी थी जिसके आस पास कपड़ों का ढेर पड़ा था।

“इस बार बहुत दिन बाद आए बेटे”, चाची ने पानी का गिलाश देते हुये कहाँ।
“हाँ चाची , बस ऐसे ही नहीं आ पाया “
“विनोद कहाँ है ?”, मैंने इधर उधर देखते हुये कहा।
“वो और बहू तो पिछले तीन साल से शहर में ही रहते हैं”, रेवती चाची ने मशीन चलाते हुये कहा।

कुछ देर की खामोशी के बाद में चाची को संघर्षरत छोड़कर चला आया।

   
"विक्रम"

शादी-विवाह और मैरिज ।

आज से पचास-पचपन साल पहले शादी-ब्याह की परम्परा कुछ अनूठी हुआ करती थी । बच्चे-बच्चियाँ साथ-साथ खेलते-कूदते कब शादी लायक हो जाते थे , कुछ पता ...