बुधवार, अक्तूबर 24, 2012

रेवती चाची



चित्र गूगल आभार 
रेवती चाची बीस साल की उम्र मे विधवा हो गई थी। पति की मौत के वक़्त वो पेट से थी। अपने से दस साल बड़े शराबी जगन से शादी होने के बाद उसका दो साल का वैवाहिक जीवन कष्टपूर्ण ही रहा। रोज रोज जगन का शराब पीकर घर आना और रेवती से मार पीट करना। घर के इसी घुटन भरे माहौल से परेशान होकर शादी के सालभर बाद जगन की माँ भी चल बसी थी। उसके पिता तो उसकी बाल्यवस्था  में ही भगवान को प्यारे हो गए थे।

माँ के लाड़-प्यार ने इकलौते जगन को जरूरत से ज्यादा आज़ादी दी थी जिसकी बदौलत बचपन से जिद्दी जगन जवानी मे कदम रखने से पहले ही शराबी बन चुका था। परिवार और मोहल्ले वालों के समझाने पर  जगन की माँ ने उसके फेरे करवा दिये, सोचा पैरों मे बेड़िया पड़ेंगी तो अक्ल ठिकाने आ जाएगी। अपनी  घर गृहस्थी की जिम्मेदारियाँ निभाने लगेगा तो शराब की आदत स्वत: छूट जाएगी।

शादी के बाद भी जगन की हरकतों मे बदलाव की गुंजाइस नजर नहीं आई और इसी कशमकश से परेशान होकर एक दिन उसकी माँ भी चुपके से भगवान के पास चली गई। रेवती का एक मात्र सहारा भी चला गया। दोनों सास बहू अपने बुरे वक़्तों को साझा कर लिया करती थी मगर अब तो सारे दुख रेवती को अकेले ही वहन करने होंगे।

घर में पैसे की तंगी आई तो रेवती ने सिलाई मशीन से अपना और अपने शराबी पति का भरण-पोषण करना शुरू किया। आधे से ज्यादा पैसे तो जगन की शराब मे ही चले जाते। कभी कभार बिना खाये ही गुजारा करना पड़ता। लेकिन उसे मार जरूर खानी पड़ती। कभी खाना न होने पर तो कभी खाना खाने के लिए कहने पर। अपने नसीब को कोसती वो इस इंतजार मे संघर्ष करती रही की सायद अच्छे दिन कभी तो आएंगे।

एक रात जगन घर नहीं आया ,किसी ने सुबह उसे बताया की जगन गाँव के बाहर चौराहे में पड़ा है और गाँव वाले उसको घेर कर खड़े हैं। वो तुरंत बताने वाले के साथ उस तरफ चल पड़ी। सामने से कुछ लोग जगन को कंधे पे उठाए ला रहे थे। गाँव की औरतों ने रेवती चाची को रोक लिया और उसको उसके घर में ले आई। जगन को घर के बाहर चबूतरे पर लिटा दिया। गाँव की औरते रेवती को पकड़ जगन के पास ले आई और उसके दोनों कलाइयों से चुड़ियाँ तोड़कर जगन पे डाल दी। अचानक हुये इस हादसे ने रेवती को हिलाकर रख दिया था।   

जगन के बरहवीं के कुछ दिन बाद रेवती के भाई उसको अपने साथ ले गए। मगर माँ के घर में स्वेन्दनाओं के पाँच साल गुजरने के बाद रेवती का बुरा वक़्त फिर उसके सामने आ खड़ा हुआ। उसकी माँ के देहांत के कुछ माह बाद ही घर का माहौल बदले लगा। वही भाभियाँ जो रेवती दीदी कहते नहीं थकती थी अब उस से किनारा करने लगी थी। अक्सर बात बात पे ताने मिलने लगे।  
थक हार कर अपने चार साल के बेटे विनोद को ले ससुराल मे आ गई। वो ससुराल जहां उसके सिवा उसका कोई नहीं था। अपने बंद पड़े मकान को साफ सुथरा करके वो जीवन से संघर्ष करने निश्चय कर  चुकी थी। अपनी बंद पड़ी सिलाई मशीन को हथियार बना वो कर्मयुद्ध को तैयार थी। अपनी माँ से दहेज स्वरूप मिली ये मशीन उसके जीवन यापन का एक मात्र सहारा थी।

बचपन से हमने रेवती चाची को संघर्ष करते ही देखा था। आज अपने बच्चे को पालने और लिखाने पढ़ाने की ज़िम्मेदारी निभा रही थी मगर चेहरे पे सिकन तक नहीं थी। जब भी हमारे घर आती थी उसका चार पाँच साल का बेटा विनोद उसके पल्लू से चिपका रहता था। वही उसके बुढ़ापे का एकमात्र सहारा था। विनोद कल को जवान होकर अपनी माँ की जिम्मेदारियाँ अपने कंधो पे उठा लेगा तो जीवन भर संघर्ष करती रेवती को आराम मिलेगा।  

वक़्त अपनी गति से गुजरता रहा। विनोद जवानी की देहलीज पे कदम रख चुका था। माँ की मेहनत रंग लाई और उसे एक कंपनी मे अच्छी पगार पे नौकरी भी मिल गई। रेवती चाची के दुखों का अंत हो गया था। वो अपनी खुशी को दोगुना करना चाहती थी। उसने विनोद की शादी करदी और घर में दुल्हन के आने से चहल पहल बढ़ गई थी। वो घर जो सुना सुना सा रहता था आज भरा भरा सा लग रहा था। रेवती चाची की मेहनत आखिर रंग लाई और उसने दुखों से संघर्ष कर खुशियों को हासिल किया।
विनोद की शादी के लगभग पाँच साल बाद दो दिन के लिए किसी कारणवश गाँव आया तो सोचा जाने से पहले रेवती चाची ने मिलता चलूँ। मैंने दरवाजे पे दस्तक दी तो रेवती चाची ने दरवाजा खोला, मुझे पहचानते हुये मेरे सिर पे हाथ फेरा और अंदर आने को कहा। घर के आँगन के बीचों बीच एक सिलाई मशीन रखी थी जिसके आस पास कपड़ों का ढेर पड़ा था।

“इस बार बहुत दिन बाद आए बेटे”, चाची ने पानी का गिलाश देते हुये कहाँ।
“हाँ चाची , बस ऐसे ही नहीं आ पाया “
“विनोद कहाँ है ?”, मैंने इधर उधर देखते हुये कहा।
“वो और बहू तो पिछले तीन साल से शहर में ही रहते हैं”, रेवती चाची ने मशीन चलाते हुये कहा।

कुछ देर की खामोशी के बाद में चाची को संघर्षरत छोड़कर चला आया।

   
"विक्रम"

शुक्रवार, अक्तूबर 19, 2012

सर्द सुबह की धुंध


सर्द सुबह की धुंध 
में भीगकर 
तुम चली आओ ..
इस तरफ के मौसम
अपनी तपस से 
झुलसाने लगे हैं 
उन हसीन ख्वाबों को 
और लगे हैं कुम्हलाने 
तुम्हारी यादों के 
मखमली अहसास..
अपने बदन से 
लिपटी इन मनचली
ओस की बुंदों को 
झटककर गिरा दो 
उन झुलसते लम्हों पर  
जो तन्हाईयों के बोझ
तले टूटने लगे हैं.. फिर 
समेट अपनी बाहों में 
पहुंचा दो शीतलता 
के चरमोत्कर्ष पर.. 
ठिठुरने ना देना 
 अपनी गरम 
साँसों से....मुझे

"विक्रम"

सोमवार, अक्तूबर 15, 2012

फर्क


कॉलेज छूटने के बाद  निहारिका अपने सहपाठी विकाश के जिद्द करने पर उसके साथ  पार्क मे घूमने चली गई। दोनों ने वहीं पे खाना खाया और बातों ही बातों मे कब सांझ हो गई पता ही नहीं चला।

“हमे अब चलना चाहिए विकाश “, निहारिका ने कहा।

“हाँ , चलो “, कहकर दोनों बाहर जाने वाले रास्ते की तरफ बढ़ गए।

घर पहुँचकर निहारिका तुरंत अपने कमरे मे गई तो पीछे पीछे  उसकी मम्मी  भी पैर पटकती हुई पहुँच गई । निहारिका को इसका पूर्वानुमान पहले से था।

“कॉलेज से आ रही हो या नौकरी से ? शाम के छ:  बज चुके है। कुछ तो ख्याल करो। “

“आज थोड़ी देर हो गई मम्मी , ....वो विकाश जिद्द करने लगा तो हम  साथ मे पार्क चले गए  फिर खाना खाने और घूमने मे वक़्त का पता ही नहीं चला” , निहारिका ने सांस छोड़कर कुर्सी पर बैठते हुये कहा 

“लड़की जात का इतनी देर तक घर से बाहर रहना और किसी पराए मर्द के साथ घूमना अच्छी बात नहीं है, किसी ने देख लिया तो लोग तरह  तरह की बातें बनाएँगे। ऊपर से मौहल्ले वालों को बैठे बिठाये  इज्जत उछालने  का मौका मिल जाएगा। “ मम्मी  उसके पास आकर फुसफुसाते हुये कहने लगी।

“लेकिन मम्मी ऐसा वैसा कुछ नहीं है, में और विकाश सिर्फ दोस्त है। और फिर उस दिन में आपके साथ बाजार गई थी तो आपने देखा की  राहुल भैया भी उस दिन एक लड़की के साथ बाजार मे घूम रहे थे”

“उसका क्या है , वो तो लड़का है “,  मम्मी उसके कंधे को हाथ से धकेलते हुये रसोई मे चली गई ।


शनिवार, अक्तूबर 13, 2012

अस्पृश्यता


चित्र मे जो आप देख रहे हैं ये मेरे गाँव का एक पुराना कुआं है जो आज से करीब पच्चीस  साल पहले बहुत आबाद  हुआ करता था ।  एक जमाना था जब इसपर एक साथ चार  रहट चलते थे और लोग अपनी बारी के इंतजार मे इसके चारों और बने चबूतरे  पर रातभर बैठे रहते थे।   

आज से करीब 20 से 25 साल पहले अस्पृश्यता बहुत ज्यादा थी, जो आज के दौर मे थोड़ा सा कम  है। ऊंच-नीच, छुआ-छुत का काफी बोलबाला था।  ऊँची जाति के लोग (खासकर  ब्राह्मण,बनिये)  नीची जाति के लोगों के पास से निकलते हुये निश्चित दूरी बनाकर निकलते थे और किसी चीज के लेन-देन के वक़्त हाथों मे एक निश्चित फासला रखते थे। मगर हँसी तब आती थी जब कोई नीची जाति का  आदमी बनिये की दुकान से कुछ खरीदने जाता तो बनिया उसके हाथ से पैसे लेते वक़्त कोई फासला नहीं रखता मगर उसके बदले समान देते वक़्त फासला बना लेता। कभी किसी नीची जाति के किसी सदस्य को किसी ऊँची जाति के घर किसी काम से जाना होता तो वो वहाँ पहुँचकर  घर के बाहर ही खड़ा हो जाता , उसको अंदर आने मे झिझक होती थी , हालांकि मैंने कभी सुना नहीं की किसी ऊँची जाति के आदमी ने उसको अंदर आने से मना किया हो , लेकिन लोगों ने अपनी धारणा कुछ ऐसी बना ली थी। ना कभी  नीची  जाति के लोगों ने  आगे बढकर इस अस्पर्शयता की दीवार को लांघने  की हिमाकत की और ना ही ऊँची जाति के लोगों ने इस दीवार की गिराने की।
...ऊँची जाति के लोग (खासकर ब्राह्मण,बनिये) नीची जाति के लोगों के पास से निकलते हुये निश्चित दूरी बनाकर निकलते थे और किसी चीज के लेन-देन के वक़्त हाथों मे एक निश्चित फासला रखते थे। मगर हँसी तब आती थी जब कोई नीची जाति का आदमी बनिये की दुकान से कुछ खरीदने जाता तो बनिया उसके हाथ से पैसे लेते वक़्त कोई फासला नहीं रखता मगर उसके बदले समान देते वक़्त फासला बना लेता।  

पानी की सतह  उन दिनों करीब सौ हाथ पे होती थी, यानि 150 फीट के आस पास। इसके आमने सामने के मुख्य भाग पे  पत्थर की बड़ी बड़ी सिलाओं  पे दो दो रहट आमने सामने लगे रहते थे । उस वक़्त इसका नाम “चार भूण (रहट) वाला कुआ” था जो आज भी वही है।  दाईं तरफ के दोनों रहट ऊंची जाति के लोगों के लिए थे और बायीं तरफ के दोनों रहटों में से एक ज्यादा नीची जाति और दूसरा कम नीची जाति के लिए आवंटित था।

ऐसा ही कुछ कुए से पानी निकालते  वक़्त होता , ज्यादा भीड़ होने पे ऊँची जाति के लोग नीची जाति वाले रहट की तरफ खिसकने लगते । चूंकि नीची जाति के लोगों की संख्या कम थी तो वहाँ भीड़ नहीं रहती थी। जब वहाँ नीची जाति के लोग नहीं होते तो ऊँची जाति वाले उस जगह पे थोड़ा पानी छिड़कते और उसके बाद अपने मटके वहाँ रख लेते। लेकिन कभी किसी का ध्यान उस तरफ नहीं गया की आखिरकार पानी तो उसी कुए से आता है  जिसमे दोनों जाति के लोगों की  रस्सी से बंधे बर्तन (डोल ) डुबकी लगाकर बाहर आते हैं। कभी कभी दोनों जातियों की रस्सियाँ और डोल अंदर आपस मे उलझ जाते और ऊपर आने पर वो अपनी अपनी रस्सियाँ अलग करके फिर से पानी खींचने मे लग जाते ।

ऐसा ही हाल कुए के बगल मे बने मंदिर में था। ऊँची जाति के लोग बड़े मजे से मंदिर के अंदर जाकर भगवान के दर्शन और पुजा-अर्चना कर  लेते थे मगर नीची जाति के लोगों के लिए मंदिर की सीढ़ियों के पास ही एक जगह निर्धारित की हुई थी जहां खड़े होकर वो “ऊँची जाति के  भगवान” की एक झलक पा लेते और वही से पूजा-अर्चना कर वापिस लोट जाते ।   

मतलब उस वक़्त मौकापरस्ती वाली छुआ-छूत थी। अगर समय है तो जात दिखाओ अन्यथा गर्दन नीची करके काम निकाल लो।  अब वक़्त ने करवट बदली है , बिजली पानी मे कुछ सरकारी दखलंदाज़ी होने से अब पानी खींचना नहीं पड़ता।   आज कभी गाँव जाता हूँ तो देखता हूँ तो वही नीची जाति के लोग जो घर के अंदर आने मे झिझकते थे आज बे-धडक अंदर आ जाते हैं और इशारा पाने पर पास रखी कुर्सी या स्टूल पे धडल्ले से  बैठ जाते हैं। हाथ मिलाना,साथ चलना तो आम हो गया। कुए की जगह अब पानी की टंकियाँ बनी है जिसमे नल लगे हैं मगर अब उन नलों  का जाति के हिसाब से बंटवारा नहीं किया गया। ये सामाजिक बदलाव की पहल वक़्त ने की है न की किसी जाति विशेष ने।

"विक्रम"

शनिवार, अक्तूबर 06, 2012

मोटापा

(चित्र आभार गूगल)

आज प्रातकल पार्क में भ्रमण के दौरान बैंच पर फैले एक बारह तेरह साल के  स्थूलकाय  बच्चे ने मुझे घूमते हुये देखकर  कहा ।

“हैलो अंकल ! वाकिंग ?”

“येस” , मैंने उसके  शरीर की थुलथुलाहट से प्रभावित होकर  बड़ी विनम्रता से मुस्करा कर जवाब दिया।

“गुड...गुड  .... कीप इट अप” , उसने मेरी तरफ “थम्स-अप” का इशारा करते हुये मुझे प्रोत्साहित किया , और अपने शरीर को नजरंदाज कर मेरी चिंता मे कुटिलता से  मुस्कराता रहा।
...उसका सीना लटककर पेट के हिस्से पे काबिज हो गया था। पेट सामने की तरफसे नीचे खिसककर कटि-क्षेत्र मे घुसपेट कर चुका था, जिससे उसके संवेदनशील हिस्से अपना अस्तित्व खोते जा रहे थे। 

इस उम्र मे ही उसका वजन अस्सी के आस  पास रहा होगा , यानी लगभग मेरे बराबर। उसका सीना लटककर पेट के हिस्से पे काबिज हो गया था।  पेट सामने की तरफ से नीचे  खिसककर कटि-क्षेत्र मे घुसपेट कर चुका  था, जिससे उसके  संवेदनशील  हिस्से अपना अस्तित्व खोते जा रहे थे।  उसके गले की मोटाई ने सुराहीदार गर्दन या लंबी पतली गर्दन की कल्पनाओं को सिरे से खारिज कर दिया था। उसके मुस्कराने से उसके मोटे शरारती गालों को लुप्तप्राय हो चुकी नाक को चूमने का बहाना मिल जाता था  घर में पूजा या किसी अन्य धार्मिक उत्सव के दौरान उसकी कलाई पे बंधा  लाल धागा उसके हाथ के लटके मास में फंसा अपनी बेबसी पे  मुझे  ताक  रहा था।  मगर इन सबके बावजूद उसे में मोटा नजर आ रहा था।

मेरी तरफ फेंकी गई उसकी कुटिल मुस्कान ने मुझे हैरत मे डाल दिया। मैंने थोड़ा आगे जाकर उसकी नजरे बचाकर अपने शरीर का मुआइना किया। शरीर के दायें बाएँ हल्का सा उभार सिर उठाने लगा था मगर वक़्त की नजाकत के मद्देनजर उसे छुपाया जा सकता था।  हालांकि इन सबके बावजूद मुझमे भी आंशिक रूप से  मोटापे के  आसार नजर तो आते हैं लेकिन फिलहाल सभी हिस्से अपनी यथास्थिति बनाए हुये  हैं।

मैंने सोचा जब इसे या इसके आविष्कारकों को इसके मोटापे की चिंता नहीं तो में क्यूँ बे-वजह अपने पाल पोसकर बनाए  शरीर पे  अत्याचार करूँ ?


“विक्रम”


  

मंगलवार, अक्तूबर 02, 2012

खामोश लम्हे...



एक इंसान जिसने  नैतिकता की  झिझक मे  अपने पहले प्यार की आहुती दे दी और जो उम्र भर  उस संताप  को  गले मे डाले, रिस्तों का फर्ज निभाता चला गया। कभी माँ-बाप का वात्सल्य,कभी पत्नी का प्यार तो कभी बच्चो  की ममता  उसके पैरों मे  बेड़ियाँ बने  रहे। मगर इन सबके  बावजूद वो  उसे कभी  ना भुला सका जो  उसके  दिल के  किसी  कोने  मे सिसक  रही  थी। वक़्त  उसकी झोली  मे  वियोग की तड़प  भरता रहा………….                                        
               

कहाँ आसान है पहली मुहब्बत को भुला देना
बहुत मैंने लहू  थूका है  घरदारी बचाने में
                                                                          मुन्नवर राणा
(मैंने अपना ये लघु उपन्यास मशहूर शायर मुन्नवर राणा साहब के इस शेर से प्रभावित होकर लिखा है । जहां एक इंसान अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वाहण करते करते अपने पहले प्यार को अतीत की गहराइयों मे विलीन होते देखता रहा। मगर उम्र के ढलती सांझ मेन जाकर जब जिम्मेदारियों से हल्की सी निजात मिली तो दौड़ पड़ा उसे अतीत के अंधकूप से बाहर निकालने को.... 
विक्रम



अगर पढ़ने में कुछ दिक्कत हो तो आप इस लिंक से भी पढ़ सकते हैंखामोश लम्हे..

खामोश लम्हे..



 

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