बुधवार, जनवरी 23, 2013

योजना


प्राचीन समय मे एक राज्य हुआ करता था जिसके राजा का चुनाव वहाँ की जनता क्रमबद्ध तरीके से करती थी, यानी आज इस परिवार का सदस्य राजा बनेगा तो कल उसके पास वाले दूसरे परिवार का सदस्य। पाँच साल तक राजा बने व्यक्ति की खूब सेवा की जाती उसे हर सुख दिया जाता। महल के सभी दास दासियाँ उसके आगे पीछे घूमते रहते। महल की सभी रानियों पे उसका अधिकार होता था। राज्य की जनता उसे खूब सम्मान देती। राजा जो भी कहता उसकी आज्ञा का पालन किया जाता। मगर शर्त ये होती की पाँच साल के बाद उसे राज्य की सीमाओं के उस उस पार बहती नदी के दूसरी तरफ वाले जंगल मे छोड़ देते जहां या तो वो खुद भूख प्यास से मर जाता नहीं तो उसे कोई जंगली जानवर खा जाता।

...“अरे ! तूँ पागल हो गया है क्या ? अब तूँ हमारे जैसा साधारण इंसान है और आज का दिन सायद तुम्हारा आखिरी दिन है। हम तुम्हें नदी के उस पार के घने जंगल मे छोड़ देंगे जहां तुम्हें कोई जंगली जानवर खा जाएगा। “।  
जब भी पाँच साल पूरे होते यही प्रथा दोहराई जाती। जनता मे एक तरह का उत्सव मनाया जाता। बैंड बाजे और पूरी धूम धाम से राजा को विदा किया जाता। विदा होने वाला राजा मौत की सजा मिले कैदी सा आगे आगे चल पड़ता। और फिर उसी दिन कोई दूसरा साधारण आदमी राजा चुना जाता और उसे राजमहल पहुंचा दिया जाता। जब भी कोई व्यक्ति राजा चुना जाता वो बहुत उदास हो जाता,क्योंकि उसे पता होता था की अब उसकी ज़िंदगी सिर्फ पाँच साल और बची है।
 

ऐसे ही एक विदाई समारोह मे राजा को विदाई दी जा रही थी और राजा बहुत खुश नजर आ रहा था और हँसे जा रहा था। लोग सोचने लगे की आखिर राजा खुश क्यों है? कुछ ने कहा की मौत के डर से  राजा पागल हो गया है और तभी ऐसी हरकत कर रहा है। जब उसे राज्य की सीमा पर बहती नदी के उस पार के जंगलों मे छोड़ने के लिए नौका मे बैठाया गया तो वो और ज़ोर ज़ोर से हंसने लगा। नौका चला रहे मल्लाहो ने उसे डांटते हुये कहा की “अरे ! तूँ पागल हो गया है क्या ? अब तूँ हमारे जैसा साधारण इंसान है और आज का दिन सायद तुम्हारा आखिरी दिन है। हम तुम्हें नदी के उस पार के घने जंगल मे छोड़ देंगे जहां तुम्हें कोई जंगली जानवर खा जाएगा। “
 

राजा से आम इंसान बने व्यक्ति ने मुस्करा कर कहा , “अरे मूर्खो, में अब भी राजा हूँ, और अब अपने नए राज्य मे जा रहा हूँ। मैंने अपने पहले साल के कार्यकाल मे नदी के उस पार के जंगल के सभी हिसक जानवर मरवा दिये थे। कार्यकाल के दूसरे साल वहाँ के जंगल साफ करवा दिये तथा दूसरे साल वहाँ मकान बनवा दिये। तीसरे साल वहाँ सड़के और खेती के लिए उपजाऊ जमीन तैयार कारवाई थी। चौथे और पांचवे साल वहाँ जंगली कबीले के लोगों को लाकर बसाया और उनके लिए हर सुख सुविधा मुहैया कारवाई। अब में वहाँ का राजा हूँ और वो सब मेरी प्रजा है जो मेरे आने का इंतजार कर रही है ।

- विक्रम

रविवार, जनवरी 13, 2013

मेहँदी के फुल



दूर दूर तक विस्तृत रेगिस्तान। सूना और शांत। कही कही पर छोटी छोटी बेर की झाडियाँ और खेजडे के वृक्ष। शेष रेत ही रेत। आग उगलती धुप और स्तब्ध पवन। ऐसी निस्तब्धता को भंग करती हुई एक बस कच्ची सड़क पर तेज रफ़्तार से जा रही थी। बस में पूरे यात्री थे। ड्राईवर के ठीक पास दो बूढ़े चौधरी बैठे थे जिनके चेहरे पर जीवन के संघर्ष की प्रतिरूप झुर्रियाँ झलक रही थी। पीछे कितने अपिरिचित, अनजान स्त्री पुरुष। पुरुष रंग बिरंगे साफे पहने हुए व् स्त्रियां ओढने ओढ़े हुई थी। सबसे पीछे की सीट पर एक राजपूत मुकलावा (गौना) करके आ रहा था। उसके चार सीट आगे एक सेठ अपनी नवविवाहित बेटी को लेकर अपने गाँव लौट रहा था।

वह लड़की अद्वीतीय सुंदरी थी। उसका केसर सा रंग केसरिया वस्त्रों में एकमेक हो रहा था और ओढनी पर सलमे सितारे जड़े हुए थे जो उसके सौंदर्य में चार चाँद लगा रहे थे। कच्ची सड़क होने की वजह से हिचकोले जरूरत से ज्यादा आ रहे थे पर ड्राईवर अत्यंत सजगता से स्टीयरिंग सम्हाले था। अप्रत्याशित,जिधर बस जा रही थी उसके पूर्व की ओर धुल के बादल उड़ते नज़र आये। सारे यात्री शंकित हो गए। एक चौधरी ने बीडी सुलगाते हुए कहा,“शायद ‘भटलोटिया’ (हवा और धुल का गुब्बार) उठा है।” दूसरा चौधरी जिसकी आवाज़ भारी थी,बोला “आंधी भी आ सकती है।इस मरुभूमि में बरखा कम आंधी ज्यादा आती है।” सेठ ने अपनी इन्द्रधनुषी पगड़ी को उतारकर अपने गंजे सर पर चमकती पसीने की बूंद को पोंछा।फिर अपनी लाडली नवविवाहित लड़की मन्नी से धीरे धीरे कहने लगा, “सुन री लाडली, आंधी आने वाली है, जरा सचेत रहना।”

नवविवाहिता मन्नी ने गले में सोने का तिमणिया और काठलिया पहन रखा था। सिर पर बड़ा बोर था। दोनों कानो में बालियाँ झलमला रही थी।नाक में काँटा था।पांवो में चांदी के भारी भारी बिछ्वे।बाप का संकेत पाकर मन्नी ने अपने ओढने से अपने शारीर को ढांक लिया। मुकलावा करके आने वाला राजपूत अपनी कमर में लटकती तलवार को यूँ ही देख रहा था। उसके समीप उसका मित्र अपने हाथ की कटार से खेल सा रहा था। धुल के बादल और गहरे हुए।वे बस के समीप आने लगे।यात्रियों की आँखे उस ओर जम गयी।ड्राईवर ने बस की रफ़्तार को और तेज कर दिया। तभी गोली की आवाज़ सुनाई पड़ी। गोली की आवाज़ के साथ यात्रियों ने देखा कि धुल के बादलों को चीरती हुई एक जीप आ रही है।जीप में चार आदमी बैठे हैं जिनके चेहरे कपड़ो से ढके हुए हैं।

एक यात्री चिल्लाया, “डाकू! डाकू आ गए हैं!” सारी बस में सनसनी फ़ैल गई। डाकू शब्द फुसफुसाहट में बदल गया। सेठ ने जोर से कहा, “बस और तेज करो।” एक गोली बस के अगले शीशे के ऊपर की ओर टकराकर हवा में उड़ गयी।ड्राईवर के हाथ से स्टीयरिंग छूट गया।उसने घबराकर गाडी रोक दी।चंद क्षणों में ही जीप बस के आगे थी। अब यात्री जीप में बैठे सभी लोगो को अच्छी तरह देख सकते थे। बस में मृत्यु सा सन्नाटा छा गया था। लोग एक दुसरे को शंकित दृष्टि से ऐसे देख रहे थे जैसे वे पूछ रहें हो की अब क्या होगा? जीप में बैठे डाकू उतर आये थे। ड्राईवर के अतिरिक्त पांच लोग और थे। एक के हाथ में तनी हुई बन्दूक थी। बन्दूकधारी ने गरजकर क़हा, “तुम लोग अपनी जान की खैर चाहते हो तो चुपचाप बैठे रहो।कोई भी हिले दुले नहीं!” यात्रियों की साँसे गले की गले में रह गयी।

बन्दूकधारी ने फिर अपना परिचय दिया, “मैं डाकू तेज सिंह हूँ। मैं तुम लोगो में से किसी को कुछ नहीं कहूँगा...मैं सिर्फ इस सेठ की बेटी को लेने आया हूँ।” शेष यात्रियों ने राहत का अनुभव किया लेकिन सेठ और उसकी नव परिणीता बेटी काँप उठी।लड़की मन्नी अपने बाप से चिपट गयी। तेज सिंह उन दिनों राजस्थान का कुख्यात डाकू था। उसने कई जाने ली थी और वह सच्चे डाकुओं की मान मर्यादा का परित्याग कर के नीच से नीच काम करने पर उतारू हो गया था। चूँकि दुसरे डाकू अपने पेशे की नैतिकता और उसके धर्म को लेकर चलते थे, इसलिए उन्होंने तेज सिंह को स्पष्ट कह दिया था कि वे अब उसके साथ नहीं रह सकते।लड़कियों की इज्ज़त से खेलना उनका धर्म नहीं है...पर वासना में लिप्त तेज सिंह ने उनकी कोई परवाह नहीं की। तेज सिंह में एक राक्षश की सारी प्रवृतियाँ उत्पन्न हो गयी थी।

तेज सिंह एक बार फिर सिंह की भाँती गरजा, “सेठ,अपनी बेटी मेरे हवाले राजी खुशी कर दे।” मन्नी ने अपने बाप को मजबूती से पकड़ इया। दोनों थर थर कांपने लगे।दोनों के चेहरे वर्षों से बीमार की तरह पीले पड़ गए थे। तेज सिंह की आँखों में रक्तिम डोरे उतर आये।वह उस खिडकी के पास आकर बोला, “सुना नहीं सेठ? लड़की को मेरे हवाले करो वरना मैं गोली मारता हूँ।” लड़की क्रंदन करती हुई अपने भयभीत बाप से और लिपट गयी। रूआंसे स्वर में बोली, “नहीं बापू, नहीं! मुझे इसके हवाले न करना...बापू...” तेज सिंह चिल्लाया, “बन्ना, जाकर लड़की को ले आ।” तेज सिंह का साथी अपने सरदार का आदेश पाकर बस में घुसा।तेज सिंह ने तत्काल एक हवाई फायर किया। सारे यात्री कलेजा पकड़ कर बैठ गये। उन्हें महसूस हुआ की गोली उनके सीने में दाग दी गयी है।सबकी आँखों में आशंकित म्रत्यु का भय और जड़ता उभर उठी।


बन्ना ने भीतर घुसकर बाप से लिपटी बेटी को छुड़ाना चाहा।बाप ने कांपते हाथों को जोड़कर प्रार्थना की, “माई बाप! मेरी बेटी को छोड़ दीजिए, में आपको सारे जेवर दे दूँगा।” परन्तु हवस में अंधे तेज सिंह को उस लड़की के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। जब बाप ने लड़की को नहीं छोड़ा, तब तेज सिंह ने बन्दूक के पिछले हिस्से से सेठ के सिर पर चोट की। आर्क्त्नादो के बीच लड़की घसीटकर बाहर निकाल ली गयी। सब यात्री निर्जीव से बैठे रहे।वे गूंगे बहरे बनकर अपनी सीटों से चिपक गए थे। लग रहा था कोई भी नहीं है इस बस में।
लड़की अब भी चीख चिल्ला रही थी। बन्ना उसे अपनी बाहों में ले चूका था। तभी मुकलावा करके लौट रहे राजपूत युवक की पत्नी थोडा सा घूंघट हटाकर बस में बैठे हुए लोगो से तेज स्वर में बोली, “आप सब चुल्लूभर पानी में डूब मरिये। आपके सामने एक लड़की को डाकू उठाकर ले जा रहे हैं, और आप हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। थू है आप सब पर।” अचानक इस तेज फर्कार बस में तनिक हलचल हुई। राजपूत अपनी पत्नी को प्रशनवाचक दृष्टि से देखने लगा। 

शायद वह सोच रहा हो कि इसे यकायक यह क्या हो गया है? या हमारी कौटुम्बिक परम्पराओ को तोड़कर क्यों हुंकार रही है? सबके सामने क्यों बोल रही है? राजपूत-पत्नी की आँखों से अंगारे बरस रहे थे। उसने थोडा सा घूंघट खीचकर अपने पति से पुनः कहा, “मैं आप से क्षमा मांगती हूँ,कुंवर सा! आप मुझे मेरी इस गलती की बाद में कोई सजा दे दीजियेया,किन्तु कुंवर सा, आज मुझे मालूम हो गया कि आपकी रजपूताई घास चरने चली गयी है। जो क्षत्रिय गौ,ब्राह्मण,अबला का रक्षक कहलाता था,उसी के सामने एक लड़की मुक्ति की भीख मांग रही है और आप पत्थर की तरह चुपचाप बैठे हैं?आपका खून पानी हो गया है? वर्ना क्या मजाल थी कि एक सच्चे राजपूत के होते हुए कोई चोर डाकू किसी के बाप से उसकी बेटी छीन कर ले जाए।” आपनी पति की तेजस्वी ललकार पर राजपूत खड़ा हो गया। उसके सिर पर लाल रंग का साफा था। उसकी बांकडली मूंछो पर उसका हाथ ताव देने चला गया। जोश में उसके नथूने फडकने लगे।फिर वह अपनी तलवार की मूठ पर हाथ रखकर इतना ही बोल पाया “कुंवराणी !” कुंवराणी पूर्ववत स्वर से बोली, “आज सारे इतिहास को आग लगानी पड़ेगी। राजपूतों के शौर्य को मिटाना होगा। वरना एक राजपूत के होते हुए डाकू किसी लड़की को उठाकर ले जाए। छि: छि:!”

राजपूत चीख पडा। “क्षत्राणी,चुप रहो!”
“मैं चुप नहीं रहूंगी। मैं कहूँगी कि आप सब मर्दों को चूडियाँ पहन लेनी चाहिए।” उसने फटकारते हुए कहा।

सेठ की बेटी को जीप में डाल लिया था । वह क्रंदन करती हुई बेहोश हो गयी थी। खूंखार डाकू तेज सिंह बन्दूक  लेकर उसके समीप बैठ गया। 

उसने ड्राईवर को आज्ञा दी, “जीप रावाना करो।” पर जीप घर्र-घर्र करके रह गयी।
तेज सिंह ने बन्दूक के पिछले हिस्से से ड्राईवर को हल्का-सा धक्का देकर कहा, “जीप चलती क्यों नहीं?”

कुंवराणी ने सचमुच अपने हाथ की चूडियाँ खोलकर अपने पति की ओर बढ़ा दी, “लीजिए,इन्हें पहनकर आप बैठिये, और तलवार मुझे दीजिए।” राजपूत ने आवेश में कांपते हुए अपने स्वर पर काबू करके कहा, 

“कुंवराणी, मैं राजपूत तो वही हूँ पर समय बदल गया है।”
“समय कैसा बदल गया? राजपूत के लिए दूसरों की रक्षा करने का कोई समय नहीं होता।”
तेज सिंह पागलो की तरह चीखा, “जीप चलाओ!”

राजपूत ने किंचित व्यथित स्वर में कहा, “जरा होश में आकर बात करो। हम अभी गौना करके आये हैं। तुम्हारे हाथों की मेहंदी का रंग भी अभी नहीं उतरा है। घर पर ठुकराणी सा और ठाकुर सा हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे समय हमें मत ललकारो!” 

जीप ड्राईवर ने कहा, “सरदार, बैटरी बैठ गयी है।” तेज सिंह चीखा। “क्या बकते हो?”  “सरदार,सच कह रहा हूँ।” राजपूतानी ने हाथ जोड़कर विनीत स्वर में कहा, “आपके माता पिता जब सुनेंगे कि उनका बेटा एक लड़की की रक्षा नहीं कर पाया, तो जीते जी मर जायेंगे।”

“स्थिति  को देख लो। पल भर में तुम विधवा हो सकती ही !”

“विधवा?...कुंवर सा, विधवा तो मैं तब भी हो सकती हूँ जब आप खिलखिलाकर हँसे और हँसते ही परलोक सिधार जाएँ। पर यह मृत्यु कितनी महान और आदरमयी होगी ! यदि आपने उस अबला की रक्षा नहीं की, तो मैं समझूंगी कि मैं जीते जी विधवा हो गयी हूँ।”

राजपूत अब अपने आप को रोक नहीं सका। वह बावला हो गया। उसके नेत्र से अंगारे से दहकने लगे। वह तडपकर बोला। “तुम राजपूत के जौहर देखना चाहती हो?”

“मैं उसे अपने धर्म पथ पर चलते देखना चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ, वह अपने अतीत को न भूले। वह अपने शौर्य और कर्तव्य को ना भूले।”

उसी समय एक कार आ गयी। तेज सिंह ने अपने ड्राईवर को तत्परता से कहा, “इस कार की बैटरी लगाओ।” उसने हाथ के इशारे से कार को रोक दिया। राजपूत ने अपने साथी की कटार  ली। भूखे बाज की तरह वह बस से उतरा। तेज सिंह बन्दूक लिए खड़ा था। राजपूत ने अपनी कटार फेंकी, कटार तेज सिंह की पीठ पर जा कर लगी। तेज सिंह ने बन्दूक तानी। राजपूत तलवार निकालकर उस पर झपटा। फायर! राजपूत का एक हाथ जख्मी हो गया। उसने उसकी कोई परवाह नहीं की, वह तेज सिंह पर टूट पडा। उसको इस तरह टूटते हुए देखकर राजपूत का साथी भी लपका। तेज सिंह दूसरा फायर करना चाहता ही था कि उसके साथी ने बन्दूक को पकड़ कर ऊपर कर दिया।

राजपूत ने तलवार के वार शुरू कर दिया। जिस डाकू के तलवार लग गयी, वह वहीँ ढेर हो गया। लेकिन तेज सिंह बलिष्ठ और साहसी था। उसने जोर के धक्के से राजपूत के साथी को गिरा दिया। बन्दूक को उस पर तानकर जैसे ही फायर करना चाहा, वैसे ही राजपूत ने तेज सिंह पर तलवार का वार कर दिया। तेज सिंह को एक बार धरती घूमती हुई लगी। उसकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया। लेकिन वह खूंखार भेडिया फिर से संभला। पूरे जोश के साथ फिर से वह राजपूत पर टूट पडा।

तभी राजपूतानी चिल्लाई, “आप सब बस में बैठे बैठे क्यों डर रहे हैं? जाइए न, उनकी मदद कीजिये!जाइए!”

उसकी ललकार पर एक जाट और ड्राईवर कूद पड़े। ड्राईवर के हाथ में एक लोहे की हथौड़ी थी। जाट ने आई हुई कार का हेंडिल खोल लिया। दोनों तेज सिंह पर टूट पड़े।
फायर!  चीखे।

लोगो ने देखा कि राजपूत एक ओर लुढक गया है। अब राजपूतानी अपने को रोक नहीं सकी। बेतहाशा अपने पति की ओर लपकी। पहली बात लोगो ने उस वीरता की तेजस्वी महान नारी के दर्शन किये। उसका चेहरा अद्भुत ओज से दीप्त था। आँखे बड़ी बड़ी और साहस की प्रतीक थी। राजपूतानी को उतरते देख बस की भीड़ डाकुओं पर टूट पड़ी। डाकू तेज सिंह भी बेहोश हो गया था। उसके साथी बस के कब्ज़े में थे।

राजपूत घायल अव्स्तहा में तड़प रहा था। वह अस्फुट स्वर में कह रहा था, “पानी!...पानी...!”
राजपूतानी ने आकुल स्वर में कहा, “पानी!”

तुरंत पानी लाया गया पानी की बुँदे जाते ही राजपूत ने आँखे खोली। उस समय तक सेठ भी सचेत होगया था। जब उसे मालूम हुआ कि उसकी बेटी की रक्षा के लिए एक वीर ने डाकुओं से संघर्ष किया है, तब वह राजपूत की और लपका। मन्नी को भी पानी छिडककर सचेत कर लिया गया था; वह भी राजपूत के पास आ गई थी।

राजपूत ने स्नेह विगलित स्वर से कहा, “कुंवराणी,वह लड़की कहाँ है?”

कुंवराणी ने सजल नयनों से देखा। तभी सेठ ने कहा, “यह रही मन्नी, मेरी बेटी, बिल्कुल ठीक है। आओ बेटी, इधर आओ। तुझे तेरा भैया पुकारता है।”

मन्नी राजपूत के पास आई। राजपूत का एक हाथ बिल्कुल घयाल हो चूका था। एक गोली सीने में लगी थी। लहूलुहान दूसरा हाथ भी था, किन्तु दूसरे हाथ से मन्नी को आशीष दिया। उसके सिर पर हाथ रखकर धीमे से बोला, “अच्छी है न बहन?”

मन्नी से कुछ बोला भी नहीं गया। वह फफक पड़ी। बाद में राजपूत ने राजपूतानी की ओर देखा। उससे वह टूटते हुए स्वर में बोला, “कुंवराणी! “मैंने तुम्हारी बात पूरी कर दी, वह लड़की अच्छी है...अच्छा कुंवराणी, भूल चूक माफ करना। मेरे माँ बाप की जिम्मेदारी अब तुम्हारी है। वे बहुत बूढ़े हो चुके हैं।”

कुंवराणी दहाड़ मार बैठी, “नहीं,नहीं! ऐसा नहीं हो सकता! इन्हें जल्दी से अस्पताल ले चलिए।”

राजपूत के चेहरे का ओज निस्तेज हो गया। वातावरण में मृत्यु की ख़ामोशी और सन्नाटा छाता गया। सारे यात्रियों की आँखे नम थी। समीप ही तेज सिंह अचेत पडा था। जो कार आई थी, उससे राजपूत को अस्पताल ले जाए और पुलिस को खबर करने की व्यवस्था की गयी। लेकिन राजपूत का रक्त बहुत बह चूका था। उसने एक बार फिर कुंवराणी की तरफ देखा। उसके हाथों से मेहंदी के फूल महक रहे थे। राजपूत अपनी आँखों से उन मेहँदी के फूलों को देखता रहा जो सुहाग के चिन्ह थे। राजपूतानी विपुल वेदना से तड़प रही थी। 

वह एक बार फिर चीखी, “इन्हें अस्पताल ले चलिए।”

लोगों ने राजपूत को उठाना चाहा। उसने हाथ से न उठाने का संकेत किया। उसका चेहरा स्याह हो गया। उसने एक बार फिर मेहँदी रचे कुंवराणी के हाथों को देखा। मुस्कुराया। उन्हें चूमा। कुंवराणी दर्द से काँप रही थी। उसने कांपते स्वर में कहा, “आप बिल्कुल ठीक हो जायेंगे, इन्हें जल्दी अस्पताल ले चलिए।” और राजपूत ने कुंवाराणी के हाथों को अपने सीने से लगा लिया। 

उसकी आँखे फट गयी। उसके हाथ फ़ैल गए। कुंवराणी और सारी उपस्तिथि सुबक पड़ी। कुंवराणी ने अपने हाथ उठाये। हाथों पर बने मेहंदी के फूल खून से विभत्स धरातल की तरह सपाट बन गए थे, जैसे हाथों पर कुछ था ही नहीं, सिर्फ रक्त ही रक्त !

- यादवेन्द्र शर्मा 'चंद्र' 

रविवार, जनवरी 06, 2013

पैसा और दोस्त

पच्चीस सालों बाद अचानक स्कूल के एक दोस्त का फोन नंबर मिला तो गोपाल खुशी के मारे उछल पड़ा। दोनों दोस्त 2 साल तक  साथ साथ पढे थे मगर बाद मे आगे की पढ़ाई के लिए  दोनों अलग अलग हो गए , मगर वर्षों तक दोनों के दरम्यान पत्रों का सिलसिला चलता रहा ।  पत्रों के माध्यम से दोनों दोस्तों की दोस्ती  लगातार चलती रही मगर अपनी अपनी मजबूरीयों के कारण कभी मिल न सके ।
 
 वक़्त गुजरता गया और   धीरे धीरे पत्रों का आदान प्रदान भी कम होंने लगा । हर महीने आने वाले पत्र अब छ:  महीने  और फिर एक साल के अंतराल से आने लगे । और फिर धीरे धीरे ये सिलसिला भी टूट गया। संचार क्रांति आई तो  दोस्तों ने एक दूसरे को संचार माध्यमों के द्वारा खोजना  शुरू  किया।  सोसल साइट्स से लेकर सर्च इंजनों मे तलाश चलती रही।  उनकी मेहनत रंग लाई और आज गोपाल को अपने दोस्त के बेटे का फोन नंबर मिला । अपने दोस्त के बेटे से बात करके बहुत खुश हुआ।  गोपाल ने  दोस्त के बेटे से अपने दोस्त सुदर्शन  के बारे मे पूछा और उससे  बात करवाने को कहा।  बेटे ने कहा अंकल ,"पापा शाम को मिलेंगे तब आप फोन करना"
 
गोपाल शाम होने का  इंतजार करने लगा और फिर आखिरकार पच्चीस साल पहले बिछुड़े दोस्त से  बात हुई तो  मारे खुशी के बरबस आँखों मे आँसू निकाल आए । दोनों  दोस्त देर तक बातें करते रहे , अपने स्कूल के दिनों से लेकर अब तक के सफर को दोनों ने एक दूसरे से शेयर किया।  फोन पर बातों का सिलसिला चल निकला और दोनों दोस्त घंटों बात करते  , एक दूसरे के परिवार के बारें मे पूछते , एक दूसरे के बच्चों से बातें करते ।
 
दो महीने  तक दोनों दोस्त आपस मे अपने स्कूल के दिनों के चर्चे करते और हँसते रहते । दोनों ने अपने बेटे बेटियों की शादी मे मिलने के वादे किए । 
 
 एक दिन बातों बातों मे सुदर्शन ने गोपाल से कहा ,"यार मेरे अकाउंट मे बीस  हज़ार रुपए ट्रान्सफर कर देना , मुझे कुछ जरूरत है "। 
 
"हाँ  ठीक  है , अपना अकाउंट डिटेल्स मुझे एसएमएस   कर देना ", गोपाल ने कहा। 
 
 कुछ दिन बाद सुदर्शन का फोन आया तो गोपाल ने रिसीव नहीं किया । कुछ अंतराल पे फिर सुदर्शन ने फोन किया मगर गोपाल ने काट दिया ।  
 
उसके बाद फिर किसी का फोन नहीं आया, और दोस्ती का सालों का सिलसिला सदा के लिए टूट गया ।
 
- "विक्रम"
 
 

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