शनिवार, फ़रवरी 16, 2013

जज़्बात



बरसों बाद भी महफूज़ रखा है
तेरे  शहर ने बीते लमहात को  

उधर उस राहगुज़र
के दोनों किनारों पर
साथ-साथ चलते हुये
हम आज भी
अक्सर नजर आते हैं

एक दूसरे को अक्सर
कनखियों से देखना , फिर
नजरों का टकराना ....और  
मसलसल देखते जाना.....

बहानों की आड़ मे
मिलने के कवायत
और मिलने पर रोकती
समाज की रवायत

चलो फिर गुलजार करें
दिल के दरीचे को, जो
खिज़ा की आंधीयों से
जमींदोज़ हुये पड़े है

क्यों न हम फिर से   
जगाएँ उस अहसासात को
आज तुम कुछ हवा तो दो, 
मेरे जज्बाती खयालात को

 

/विक्रम/

 

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12 टिप्‍पणियां:

  1. बहानों की आड़ मे
    मिलने के कवायत
    और मिलने पर रोकती
    समाज की रवायत
    बहुत सुन्दर भावनात्मक प्रस्तुति .नारी खड़ी बाज़ार में -बेच रही है देह ! संवैधानिक मर्यादा का पालन करें कैग

    उत्तर देंहटाएं
  2. चलो फिर गुलजार करें
    उस दरीचे को, जो
    खिज़ा की आंधीयों मे
    जमींदोज़ हुआ पड़ा है


    kyaa baat hai ....!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. चलो फिर गुलजार करें
    उस दरीचे को, जो
    खिज़ा की आंधीयों मे
    जमींदोज़ हुआ पड़ा है ......bahut khubsurat abhiwayakti.....

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह, बहुत ही लाजवाब रचना.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी ये बहुत उम्दा रचना ..भाव पूर्ण रचना .. बहुत खूब अच्छी रचना इस के लिए आपको बहुत - बहुत बधाई

    मेरी नई रचना

    खुशबू
    प्रेमविरह

    उत्तर देंहटाएं

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