मंगलवार, अप्रैल 16, 2013

पल


मैं अक्सर ,  
अतीत के झुरमुटों से,
बीते हुये पल चुनता हूँ
 
धूल से सने मुस्कराते पल
भूले बिसरे  कुमलाते पल

तुम्हारी हँसी से खिले पल
शिद्दत से टूटकर मिले पल

मिले हैं कुछ शिकायती पल
मगर हैं  बड़े किफ़ायती पल

बैठे हैं ऐंठकर कुछ रूठे पल
गुस्से से तुनककर उठे पल

मुझे देख होते, हैरान से पल
खामोश और परेशान से पल

कुछ मेरे कुछ तुम्हारे पल
सब मिल बने  हमारे पल

 
//विक्रम

 

 

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14 टिप्‍पणियां:

  1. खुशी मिलती यहाँ एक पल के लिए
    बचा के कर रख प्यारे कल के लिए
    रेत के जैसा फिसलता हुआ वक़्त है
    मत गँवाना कपट और छल के लिए,,,
    वाह !!! बेहतरीन रचना,आभार,
    RECENT POST : क्यूँ चुप हो कुछ बोलो श्वेता.

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  2. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी यह प्रस्तुति कल के चर्चा मंच पर है
    कृपया पधारें
    charchamanch.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं
  4. Pal saarthak ho jate hain jab apne apne palo se hamare pal bante hain ...
    Aise hi khoobsootar palo ki dastan ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. सार्थक प्रस्तुति | सुन्दर लेखन | आभार

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

    उत्तर देंहटाएं
  6. तुम्हारे हमारे पलों से जब अपने पल बन जाते हैं तो वो सार्थक हो जाते हैं ...
    भावभीनी रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर....बेहतरीन प्रस्तुति !!
    पधारें बेटियाँ ...

    उत्तर देंहटाएं
  8. जीवन के ये अनकहे पल मंहगे भी हैं और किफायती भी
    वाह बहुत सुंदर अनुभूति
    बधाई आपको
    आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों

    उत्तर देंहटाएं

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