शनिवार, दिसंबर 21, 2013

तन्हा सा लम्हा

परछती के तिमिर
तन्हा से कोने मे
शिथिल श्लथ    
एक अधूरा सा लम्हा...
है प्रस्फुटन के लिए
व्याकुल सा...
 
जब कभी झुलसाती है
विरह की उष्णता
तब.. मुझे
पड़ता है  संभालना
रखकर    
तरबतर, चक्षुजल से,
उस अधूरे लम्हे को...
 
मेरे ख़्वाबों में लुप्तप्राय –सा  
वो अतीत   
वो नैसर्गिक लावण्य
वो उद्धत तरुणाई
स्पर्श को ललचाता    
मृदुल  कटि सौंदर्य ...
सब सोचकर है
हतोत्साहित लम्हा ।
 
-विक्रम

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