बुधवार, दिसंबर 25, 2013

याद आता है ....

हल्की गर्मियों की
शीतल अंधेरी भोर में
माँ का आँगन में
मेरे सिरहाने बैठना ,
अपनी मथनी बांधना ,
और दही से
मक्खन निकालना...... याद आता है

मंथन के  संगीत का
मेरे कानों मे
देर तक बजना  ,
आरोह अवरोह  
के दरम्यान  
मंथन की लय का
बनना बिगड़ना
और फिर छाछ पे
मक्खन का छाना...... याद आता है ।

मक्खन आने की
सुगबुगाहट पर ,     
माँ के पास बैठकर    
बिलोने मे झांकना
और फिर माँ का
मुस्करा कर,
ठंडी- ठंडी
मक्खन की डलियाँ
मेरे मुंह मे रखना ....... याद आता है ।


"विक्रम"


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10 टिप्‍पणियां:

  1. हमे भी याद आता है जब कभी बटर लेने दुकान जाते है तो माँ के हाथ का मक्खन याद आ जाता है
    सुदर भाव है

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्यारी रचना। .....

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 26-12-2013 को चर्चा मंच की चर्चा - 1473 ( वाह रे हिन्दुस्तानियों ) पर दिया गया है
    कृपया पधारें
    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  4. मन में उठे भावों को प्रस्तुति करती सुंदर रचना...!
    Recent post -: सूनापन कितना खलता है.

    उत्तर देंहटाएं
  5. मन में उठे भावों को प्रस्तुति करती सुंदर रचना...!
    Recent post -: सूनापन कितना खलता है.

    उत्तर देंहटाएं
  6. सफ़ेद मक्खन और माँ का साथ ... कई पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं ...
    नव वर्ष की मंगल कामनाएं ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत बढ़िया प्रस्तुति...आप को मेरी ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...

    नयी पोस्ट@एक प्यार भरा नग़मा:-तुमसे कोई गिला नहीं है

    उत्तर देंहटाएं

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