शनिवार, दिसंबर 06, 2014

भूली-बिसरी

इंसान ज़िंदगी मे सबकुछ प्राप्त कर सकता है मगर उसे अपना बचपन कभी नहीं मिल सकता। अर्ध-शताब्दी गुजर जाने के दौरान अनेकों परिवर्तन हो जाते हैं और पूर्ण शताब्दी मे तो करीब करीब सब कुछ बदल चुका होता है, जिसके परिणामस्वरूप हम या आने वाली नई पीढ़ियाँ बहुत से घटनाक्रमों को भूल जाते हैं। तदुपरान्त एक नवीन सर्जन होता है मगर वो पूर्व से भिन्न होता है, और यही प्रकृति का नियम है यानि परिवर्तन।

मैंने अर्द्ध शताब्दी के दौरान जो भी देखा , ( जो आजकल लुप्तप्राय है) उसे अपने गाँव की खड़ी बोली मे तुकबंदी के साथ लिख रहा हूँ , ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी जान सकें की इन 50 बरसों मे कितना कुछ बीत गया, कितना कुछ गुजर गया......
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कठै गया बै गाम कठै गया बै नाम

कठै गया बै रिवाज कठै गया बै इंसान
दड़का भुआ , सरमण ताऊ
झुंवारा कुम्हार घोघड़ चमार
ऊदमी नायक हुकमा लुहार
गौरु महाजन , गणपत सुनार
गिन्ना नाई , ग्याना बाई
खुर्दड़ी ताई बिन बुलाई आई
तीन कुरड़ी तीन गाळ1
अगुणी खंधे की पाळ2
दो कुआ एक मंदिर
एक भोमिया एक खेत्रपाळ3
कच्ची ईंट ऊपरबंधी छान4
भीटकै5 की बाड़ न आस न जान
दूर कोई बाड़ों भेड़यां को रीवाङॊ6
आयो झरख7 वो करग्यों  कबाड़ों
खंदेह की माट्टी बाळू रेत

गोबर को लीपणो दूर दूर खेत
पाणी को पैंन्डो8 फुल्ला की इंडी9
गुलगुला सुहाळी बाजरे की पिंड्डी
लहसण की चटणी चनै को साग
पील की सिंडोरी चूल्हे की आग
भाट्ठे की चटणी गठिया रोटी

खाट्टे की राबड़ी झेरणी सूं घोट्टी
सिरै को पलटो खिचड़ी को चाट्टू
कैर को मूसळ सैर को लाड्डु

खींप की टाप्पी10 मुंज की खाट
खरसणै की हारी11 सैर को बाट
नाई हळ12, ऊंट का गिरबाण13
शक्कर घी जद आवै महमाण
कठै गई कास्सी की थाळी कठै गया बै इमरतबाण
कठै गया बै गाम कठै गया बै इंसान
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धोती साफा चाम की जुत्ती
काना मे गुदड़ा खेस दुसत्ती
कड़ी नेवरी छैलकड़ा तागड़ी
गळ मे टेवटो माथे पै रखड़ी14
सांगरी को साग चौलाई की बुज्जी
घुन्दरै को रायतो खेलरां को सब्ज़ी15
भैंस को चाट झाड़ियाँ की बित्ती
बरूँ की भरोटी, बरसात आगीति

एक आनै की पट्टी एक पीसै को बरतो
डोवटी को कच्छो डोवटी को कुड़तो
दही खिचड़ी मोटी मळाई
चूँटियों घी दही अदबिलाई
कढावणी को दूध घाट को दळीयो
घी की मिरकळी दूध को पळीयो
मंगल वार बालाजी को बार
बाजरै को चूरमों दूध की खीर
शक्कर को परसाद घी को दियो
आग की ज्योत आंगळी को छींटों
ज्योत कोनी आई तो बुज्जा कढ़वाई
पित्तर की बताई पहरावणी पहराई
मावस धोकी, रात जगाई
बहू आई तीळ तागो ल्याइ
सुहाळी बँटवाई, खुशी मनाई
कठै गई बै तीळ दिखाई कठै गई बै आण-जाण
कठै गया बै रिवाज़ कठै गया बै इंसान
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लाव और बरी पी ई और कछ
ढाणा कढ़ोई कुए की पाछ
गूण चिड़स और जुआ किल्ली16
कीलीया बारिया लोह की बिल्ली
गीरज कामळा हीरणा की डार
डोड काग फ़ौ-गादड़ी और सियार
टिड्डी दल काळा नाग और घेरा
ल्हिख जूं और बड़ा बड़ा ढेरा
बाज़ीगर की डुगडुगी और भोपां की फ
कानबेलिया की बीण और सावण की झड़
भजनी साँगी  और आल्हा गावणीया
भाट बांवरिया , डफ बजावणीया
कहाणी किस्सा, भूताँ की बात
धुणी पै सिंकता कटती रात
कठै गई बा ज़ोर की हांसी सब कीमै क्यों होग्यों सुनसान
कठै गया बै रिवाज़ कठै गया बै इंसान
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देसी मुर्गी , फेरेडों  ऊंट
चातर लुगाई लायक पूत
हुड़िए गिंडी कबड्डी कुश्ती
माल्लों फूरो डंडा बित्ती
पींग पाटड़ी, सावण का गीत

भेळा होके झुलण की रीत
काठ की सन्दुक बटेऊ का गीत
घर को फळसो माट्टी की भींत
होळी की तैयारी डफ और ढ़ोल
झांझ मंजीरा और धमाल
खेल तमाशा, भरज्या चौक
नाचो गाओ, ना रोक ना टोक
गोबर का बड़कुल्ला, ढाल तलवार
पाणी का गैर कोरड़ा की मार
दादा-दादी, ताऊ और ताई
भाभी का कोरड़ा, देवरां की पिटाई
मीटग्या सब बैर, सारा भाई भाई
कठे गई बा होळी कठे गई बा डफ की तान
कठे गया बै गाम कठे गया बै नाम
कठे गया बै रिवाज़ कठे गया बै इंसान
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दिवाळी का डीबला कातिक को न्हाण
टाबरां को हीड़ों बाजरै को खाण
जोगी खोपरा पान्नी का बात्ता
रपियाँ का ठीक, बही खाता
गीरड़ी को गाटो, दोड़ कुटाई
काकड़िया मतीरा, सिट्टा भुंदाई
कोट्ठी-कुठला, हारा चूल्हा
आजकल तो सब किमै भूल्या
आई सक्रांत रूस्सा-मनाई
बाड़ा-गतवाड़ा, एक कुट्टी ब्याई
दोळा-काळा पिल्लिया ल्याई
बाड़ कै नीचै एक घुर बणाई
घर घर करता चून उघाई
तेल को सिरो रोट पुवाई
सब गाळा की होगी सफाई
ताऊ नै मिल्या दो रपिया बोतल मँगवाई
कठे गयो बो जाड्डो कठे गयो बो सम्मान
कठे गया बै गाम कठे गया बै नाम
कठे गया बै रिवाज़ कठे गया बै इंसान

बुड्ढा की सेवा, लुगाइयाँ की शर्म

सूं-सौगंध और धर्म कर्म
मिट्ठी बोली बाताँ का धणी
हांसी-ठट्टा, मसकरी घणी
अपणा पराया सब बठ्या साथ
सब ही मानै हक की बात
साची गवाही साची जामनी
चाँद नै अर्क सूरज नै पाणी
कठे ग्या बै ब्या ओटणीय, कठे गई उनकी जबान
कठे गया बै गाम कठे गया बै नाम
कठे गया बै रिवाज़ कठे गया बै इंसान

-    आखिर मे मेरे गाँव में भाइयों का एक अजीब सयोंग देखने को मिला , जिसमे एक भाई शादी-शुदा और दूसरा कुँवारा रहता था। उनका नाम सहित वर्णन कुछ इस तरह है।

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दो भाइयाँ को जोड़ो,
एक कूवारों एक ब्यायोड़ों
फत्तों-जगमाल, नारणों-पहलाद
सादुल-भादर, बालू-मेगो
टेक्कों-गोमद,चुन्नों-भूगानों
गंगाराम-मामराज,गिरधारी-नेतो
नैतो-मल्लो , दलसुख-प्रेमों
स्योपाल-चुन्नों, बंजी-नानजी
गोरधन-रामकार, पूर्णों-स्योपाल
कोई ग्यों कोई बचग्यों फेर ना देख्या ईसा मिलाण
कठे गया बै गाम कठे गया बै नाम
कठे गया बै रिवाज़ कठे गया बै इंसान

-भँवर सिंह शेखावत  ( ब्लॉगर के बड़े भाई )

 
अर्थ- 1-गली , 2- कच्चे तालाब का किनारा, 3-देवता , 4-झोपड़ी, 5-कंटीली झाड़ियां, 6-जहां भेड़ों को रखा जाता है, 7-भेड़िया, 8-जहां मटके रखे जाते हैं, 9-सिर पे पानी का मटका रखने के लिए बनाई गई कपड़े की छल्लानुमा इंडि, 10-एक झोंपड़ी जो राजस्थानी जंगली पोधे खींप से बनाई जाती है। 11-मिट्टी के बर्तन को लुढ़कने से रोकने के लिए बनाई जाने वाली हरी घास के पटसन जैसे पोधे (खरसना) की गोल छल्लेदार चीज जिसे हारी कहते हैं, 12-एक तरह का हल जो काफी गहराई तक जमीन मे पेवस्त होता है।, 13-ऊंट के नाक मे नकेल से बांधने के लिए डाले जाने वाला लकड़ी का गहनानुमा टुकड़ा। 14-आभूषणों के नाम, 15-बरसात मे अपने आप पनपने वाली हरी सब्जियाँ, 16-चमड़े के थैलानुमा झोले से ऊंट से कुए से पानी निकाला जाता था।