गुरुवार, सितंबर 17, 2015

धुंधले पन्ने

अतीत के धुंधले पन्नो पे,
वो आधी अधूरी तहरीरें
आज भी  यथावत हैं ।

उन सिकुड़े सफ़ों पे
मुज़ाकरातों के कुछ अधूरे
सिलसिले भी दर्ज़ है ।

ज़हन से खरोंचे अल्फ़ाज़
ख़ामोशीयों के आगोश में
सिमटकर  बैठे हैं  

उफ़्क तक फैले सफ़ों में,
मुख़्तसर  मुलाकातों की,
इबादतों के असआर  गायब है ।

मुखतलिफ़  हिस्सों में
वस्ल की तिश्नगी पे हिज़्र की
सूखी स्याही  फैली है ।

आओ रखलें सहेजकर
इन्हे , ज़हन के किसी
कोने मे तसव्वुर की तरह  

"विक्रम"

Related Post

widgets by blogtips

1 टिप्पणी:

मार्गदर्शन और उत्साह के लिए टिप्पणी बॉक्स हाज़िर है | बिंदास लिखें|
आपका प्रोत्साहन ही आगे लिखने के लिए प्रेरित करेगा |

 

WWWW

loading...