शनिवार, फ़रवरी 27, 2016

पुरानी यादें


हमारे गाँव के बहुत से  परिवार खेतों मे जाकर बस गए जिसकी वजह से गाँव उजड़ा उजड़ा सा नज़र आता है । हमारे घर के पास (चित्र में) ये मामराज लंबोरिया (चौधरी) का घर है । मामराज और गंगाराम दोनों भाई थे जिसमे मामराज बड़ा और शादीशुदा था जबकि गंगाराम ने  शादी नहीं की थी, या नहीं हुई थी पता नहीं । गंगाराम मे एक खास बात थी की वो रोजाना शराब पिते था मगर किसी को पता तक नहीं चलता था । गाँव मे किसी के घर से कच्ची शराब पीकर अपने घर आता और अपनी बिछी हुई चारपाई पट बैठ जाता , मामराज के बेटे बिना कहे ही उसे वहीं खाना दे देते। गंगाराम आराम से खाना खाते और तान के सो जाते। मैंने कभी उन दोनों भाइयों को लड़ते नहीं देखा। गंगाराम हालांकि मामराज के लड़कों को धमका देते थे, मगर कभी किसी ने पलट कर जवाब नहीं दिया। आज तो पैदा होते ही बच्चे माप-बाप को जवाब दे देते हैं।

बचपन मे हम लोग इनके अहाते मे और घर के सामने बने चौक मे देर रात तक खेलते थे। हम जब ज्यादा हल्ला मचाते तो गंगाराम एक आवाज लगाते और हम सब बच्चे डर कर दूर भाग जाते, बाद मे जब गंगाराम सो जाते तो हम फिर से खेलने लगते। आज तो अगर कोई किसी के बच्चों को कुछ कह दे तो लोग मरने मारने पर आमादा हो जाते हैं । आजकल ये चौक सुनसान पड़ा रहता है और यहाँ एक बच्चा भी खेलता नज़र नहीं आता।

मामराज को सिर्फ एक शौक था , हुक्का पीने का । चौबीस घंटे हुक्के का पाइप हाथ में रहता था। उसके बेटे हुक्का ठंडा होने पर उसे फिर से भर देते और मामराज फिर से उसे गुड़गुड़ाने लगते । हम लोग जब थोड़े बड़े हुये तो हम भी कभी कभी मामराज के हुक्के को खींचने पहुँच जाते, हालांकि मामराज के हाथ से हुक्का बहुत कम छूटता था ।  

इस परिवार के मुखिया यानि मामराज की पत्नी जिसे पूरा गाँव "पारो" कहता था । कहते हैं उसका असली नाम कुछ और था मगर वो "पार" गाँव की थी इसलिए पारो कहने लगे। गाँव मे किसी को अगर सिर-दर्द भी हुआ और पारो को पता चला तो वो उसके घर जाकर उसके हाल चल पूछने लगती, भले ही उसका घर गाँव के दूसरे छोर पर हो।  आज के दौर मे ऐसी इंसानियत देखने को नहीं मिलती। गाँव के हर व्यक्ति के दु:ख दर्द को पारो ने अपना दुख दर्द समझा ,कोई भी बीमार होता तो वो उसके घर के रोज चक्कर लगाकर हाल चाल पूछने चली जाती। वो गुगलवा गाँव की "मदर टेरेसा" थी। मगर जब वो खुद मरणासन्न हुई तो कोई हाल पूछने भी नहीं आया। 

मामराज और गंगाराम भी उसी दौर मे चल बसे । मामराज के पुत्र और पौत्र अपने खेतों के जाकर बस गए। अब उनके पीछे ये खंडहर हो चुका मकान जो आज तक अपने अंदर हमारे बचपन को समेटे हुये है।
“विक्रम”


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2 टिप्‍पणियां:

  1. बचपन की यादें अक्सर रुकी रहती हैं ऐसी जगहों पर ... चाहते हुए भी कदम आगे नहीं उठते ...

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  2. "पारो गुगलवा गाँव की "मदर टेरेसा" थी। मगर जब वो खुद मरणासन्न हुई तो कोई हाल पूछने भी नहीं आया" - प्रशंसनीय प्रस्तुति - यादें साझा करने के लिए आभार

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