शनिवार, जुलाई 23, 2016

ज़ख्म




पाल रखें हैं कुछ ज़ख्म मैंने ,
होता है रूहानी एहसाह कुरेदने पर जिनके ।
कभी दरमियाँ मायूसियों के जब-- मैं उनकी कुछ, 
परतें हटा देता हूँ तो ,
रिसने लगता है लहू ,आंसुओं की माफिक..
सोचता हूँ कभी , उतरकर इनमें, 
इनकी गहराई नापूँ !
 
"विक्रम"
 

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3 टिप्‍पणियां:

  1. जख्मों को नापने का प्रयास दुःख के सागर बढ़ा देता है ...
    इनकी गहराई तो भर मंदी ही ठीक है ...

    उत्तर देंहटाएं

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