शुक्रवार, अक्तूबर 28, 2016

हमीरदेव चौहान

हमीरदेव चौहान को राजस्थान एवं राजस्थान के बाहर 'हमीर हठ' वाले हमीर के नाम जाना जाता है। निश्चित ही यह वीर स्वतंत्रता-प्रिय शासक था। शौर्य एवं पराक्रम का प्रतीक था। राजस्थान जिस त्याग एवं बलिदानी परम्परा के लिए विख्यात है, हमीर ने उसे आगे बढ़ाया और इतिहास में वह पृष्ठ जोड़ा जो अन्यत्र पढ़ने व देखने में नहीं आता है।
महाकवि चंदबरदाई ने भारतवर्ष के अन्तिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पराभव को आकस्मिक ही नहीं माना बल्कि उसे नियति की एक क्रूर संरचना माना है और यह भी स्पष्ट किया कि उसे पराजित कर में का सामथ्र्य उस समय किसी के पास नहीं था। चंदवरदाई ने अपने निम्नलिखित दोहे में स्पष्ट करते हुए लिखा है
दिन पलट्यो, पलटी घड़ी, पलटी हथ्थ कबाण।
पीथल ऐही वार सू, दिन पलट्यो चहुंआण।

उत्त दोहे के मर्म को यदि उस समय के विस्तृत अध्ययन के साथ देखें तो कोई भी इतिहासकार चंदवरदाई की बात से असहमत नहीं होगा, चूंकि पृथ्वीराज की छवि ही एक सर्व शक्तिमान शासक की थी। यही नहीं, इससे पूर्व में भी चौहानों का इतिहास अत्यन्त ही गौरवशाली रहा है और अजमेर के चौहानों का इंका तो उस समय पूरे भारत में बजता था। यह तो मात्र एक संयोग और देव योग था कि किंचित् उस भूल (दुश्मन को प्राण दान देना) का, जिसे भूल न कहकर | अब तक हम भारतीय गर्व करते रहे हैं, दुश्मन ने लाभ उठा लिया और हम पर विजय प्राप्त कर ली। खैर, जो भी हुआ वह इतिहास के पन्नों पर अंकित हो गय लेकिन पृथ्वीराज के पराभव के बाद भी चौहान व अन्य राजपूत शासक अपनी उसी गौरवशाली परम्परा का अनुसरण करते रहे।

पृथ्वीराज के पुत्र गोविन्दराज ने तराईन के युद्ध अर्थातू 1192 ई के बाद 1194 में रणथम्भोर के पर्वतीय अंचल में अपना एक पृथक राज्य स्थापित का लिया और आगे के शासक राज्य को सुसंगठित करने में लगे रहे। और हमीर के बीच के समय में रणथम्भोर की कीर्ति पताका दूर-दूर तक फहराती दिखलाई दी। चूंकि चौहानों का क्षेत्र दिल्ली के भी समीप था, अत: वह बहुत शीघ्र ही उनका आँखों में आ गया। हमीर द्वारा भीमरसपुर, मदालकीर्ति दुर्ग, घाना नगर उजैन (मालवा) आदि कई प्रमुख स्थानों पर अधिकार कर लेने के उपरांत रणथम्भौर दिल्ली के सुल्तानों को और भी अधिक खटकने लग गया। कारण भी स्पष्ट था, हमीर ने न केवल उजैन पर विजय प्राप्त की वरन् क्षिप्रा के तट पर बने महाकालेश्वर मंदिर का, जिसे इल्तुतमिश ने धूल-धुसरित किया था, जीर्णोद्धार करवाकर अपने ईष्ट देव शंकर भगवान (महाकाल) की पूजा-अर्चना जो की थी। यह भला दिल्ली के मुस्लिम शासकों को स्वीकार कैसे हो सकता था उनका भयभीत होना स्वाभाविक था |

अंतत:, उस समय दिल्ली की गद्दी पर बैठा जलालुद्दीन सन् 1290 में हमीर की बढ़ती शान को कुचलने के लिए एक विशाल सेना लेकर रणथम्भोर की ओर कूच कर ही गया। इससे पूर्व भी सन् 1209 में कुतुबुद्दीन एबक और बाद में सन् 1226 में इल्तुतमिश के आक्रमण का रणथम्भोर शिकार हो चुका था किंतु अधिक दिनों तक इसको अपने अधिकार में नहीं रख सके थे। यही हस्र जलालुद्दीन खिलजी का भी हुआ और यहाँ पहुँचकर भी वह इसे हस्तगत नहीं कर पाया। हमीर एवं वीर राजपूतों के आगे वह नहीं ठहर पाया तथा दिली की ओर भागने पर विवश हो गया।

1296 ई. में जलालुद्दीन का भतीजा अलाउद्दीन दिल्ली के तख्त पर बैठा। यह नया सुल्तान बहुत ही महत्वाकांक्षी और कट्टर धर्माध था। गद्दी पर बैठते ही उसने सन् 1300 में बयाना के प्रांतपति उलुग खां और कड़ा के प्रांतपति नुसरत खां को रणथम्भौर पर आक्रमण करने का आदेश दिया। 'हमीर काव्य' के अनुसार शाही सेना में 80,000 घुड़सवार और विशाल पैदल सेना थी। बादशाह के निर्देशानुसार उलुग खां ने हमीर के पास एक संदेश भेजा कि उसके स्वामी   (अलाउद्दीन) के हृदय में राय (हमीर) के प्रति कोई द्वेष नहीं है और यदि राय | शरणागतों (मंगोल महिमाशाह एवं अन्य मुगल अमीरों) को मौत के घाट उतार दे या उन्हें सौंप दे, तो शाही सेना दिल्ली लौट जायेगी। हमीर से यह भी कहा गया कि वह पत्र में निहित अनुदेशों पर अमल करने से इंकार करता है तो वह आगे के परिणामों का सामना करने के लिए तैयार रहे। स्वाभिमानी हमीर ने इसे एक चुनौती समझा और शरणागत आये महिमा मंगोल एवं मुगलों को लौटाना अपनी आन, बान और शान के विरुद्ध एवं अपमान तुल्य समझ तत्काल दूत को इन्कारी का पत्र थमा दिया। हमीर के दिये उत्तर को काव्य में इस तरह दर्शाया कि ;
धड़ नच्चे लोहू बहे, परि बोलै सिर बोल।
कटि कटि तन रन में परै, तो नहीं देहूँ मंगोल।

यहीं से 'हमीर की हमीर हठ' जैसे सर्व लोकप्रिय और सर्वमान्य धारणा का जनता-जनार्दण में चलन हुआ। आज भी उनके सम्बन्ध में अधोलिखित काव्य की दो पंक्तियाँ लोगों के मुँह पर अमिट है कि  सिंह गमन, सत्पुरुष वचन, कदली फले इकबार। तिरिया तेल, हम्मीर हठ, चढ़े न दूजी बार। बस अब क्या था, दोनों और से युद्ध की तैयारियां शुरू हो गई और बादशाह या के दोनों प्रांतपति रणथम्भौर पर चढ़ आये। हमीर भी पूर्णतया तैयार था। ज्यों ही युद्ध प्रारम्भ हुआ, राजपूती सेना ने ऐसा हमला बोला कि गुजरात में तहलका मचाने वाले उलुगखां और नुसरत खाँ के पाँव ही उखड़ गये। और नुसरत खाँ तो इस युद्ध में ढेर ही हो गया। खिलजी सेना उल्टे पांव दिल्ली की ओर भागी।

अलाउद्दीन के शब्दकोश में पराजय जैसा शब्द नहीं था। हम्मीर के हाथों पराजय का मुँह देखना पड़ा, उसने तो सपने में भी कल्पना नहीं की थी। उसने पुन: रणथम्भोर को इस पराजय को विजय में बदलने के लिए जोरों से तैयारियां करना शुरू कर दिया और वह जुलाई 1301ई. हमीर को चुनौती देने आ डटा। इस बार उसके मस्तिष्क में सैनिक कार्यवाही के साथ छल-कपट व कूटनीतिक चालें भी चलने की सोच कर आया था। कुछ दिनों तक दोनों और से छुटपुट कार्यवाहियां होती रही किंतु जब अलाउद्दीन ने देखा कि राजपूत पूरी तैयारी से है और उन्हें झुकाना असम्भव है तो उसने छल-कपट का सहारा लिया। हमीर के दो मंत्रियों रणमल और रतनपाल (खिलजी वंश का इतिहास, डॉ. किशोरी शरण लाल)

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