शनिवार, जुलाई 23, 2016

ज़ख्म




पाल रखें हैं कुछ ज़ख्म मैंने ,
होता है रूहानी एहसाह कुरेदने पर जिनके ।
कभी दरमियाँ मायूसियों के जब-- मैं उनकी कुछ, 
परतें हटा देता हूँ तो ,
रिसने लगता है लहू ,आंसुओं की माफिक..
सोचता हूँ कभी , उतरकर इनमें, 
इनकी गहराई नापूँ !
 
"विक्रम"
 

मंगलवार, जुलाई 19, 2016

हाइकु


( पहली बार "हाइकु" लिखने की कोशिश  )

वोट मांगते
खींसे निपोरकर
निर्लज नेता

 
हवाई किले 
पंचवर्षीय नीति
खट्टे अंगूर

 
भूखी जनता
सरकारी अमला
ऐशों-आराम

 
सुरसा मुँह
गरीबी उन्मूलन
असाध्य रोग

 
विक्रम”