रविवार, नवंबर 13, 2016

भक्तगण कृपया ध्यान दें !


अगर आप अपने आपको निष्पक्ष मानते हैं, तो आपको अपने विरोधी द्वारा किए गए अच्छे काम की भी तारीफ करनी चाहिए।  मगर साथ ही  खराब  काम करने पर “अपने” की आलोचना से भी मुँह नहीं मोड़ना चाहिए वरना लोग आपको “भक्त” कहने लगेंगे। भक्तों के इस दोहरे रवैये से “भगवान” की इमेज खराब होती है । “भगवान” भक्तों की बदौलत है , ना की “भक्त” भगवान की बदौलत। इसलिए तारीफ वहीं करें जहां उचित हो, और जहां उचित ना हो वहाँ बगलें ना झाँकें बल्कि विरोध के सुर निकालें , नहीं तो लोग आपके माथे पर “भक्त” का लेबल चिपका कर निकल लेंगे ।

“भगवान” की ही नहीं खुद (भक्त) की भी स्व-समीक्षा (Self-Review) जरूरी है । अगर कोई सही काम करने पर भी “आपके भगवान” को गाली देता है तो उस नादान को माफ कर देना चाहिए । वैसे  भगवान भी की  गाली सुनने की लिमिट सौ गाली तक है , तो इस लिहाज से “भक्तों” को कमोबेश 50 के आंकड़े तक को धीरज रखना चाहिए । तदुपरान्त  हो सकता है विरोधी को आपकी चुप्पी खामोश कर दे। वरना कभी कभी इस “अंध-भक्ति” के चलते  कुछ भक्त” लोग आपस मे टकरा जाते हैं, क्योंकि कुछ अंधे होते हैं और कुछ आँखों (दिमाग) वाले।  


इसलिए , हे भक्त ! विचलित ना हो, अगर तुम्हें “भगवान” में सम्पूर्ण आस्था और विश्वास है तो इस माहौल को उसके हाल पर छोड़ दे , खराब मत कर । 
"विक्रम"