शुक्रवार, जनवरी 13, 2017

मेड़तिया राठौड़ ( भाग -3 )

अकबर ने चन्द्रसेन के भाई मोटा राजा उदयसिंह को जोधपुर राज्य प्रदान किया। मोटा राजा के समय में जोधपुर व मेड़तियों के बीच मधुर सम्बन्ध स्थापित हुए और पीढ़ियों का वैर समाप्त हो गया। मेड़तियों को अनेक जागीरें प्रदान की गई। मोटाराजा सुरताण व राजसिंह मेड़तिया ने गुजरात के बागी सुल्तान मुजफ्फर खां पर शाही सेना के साथ 1583 ई. में आक्रमण किया। मुजफ्फर खां परास्त होकर भाग गया।

 सुरताण की मृत्यु के बाद उसका पुत्र बलभद्र आधे मेड़ता का शासक बना उसके कोई सन्तान नहीं थी। अतः अनुज गोपालदास को आधा मेड़ता का अधिकार मिला। गोपाल और केशवदास तीन सदी के मनसबदार थे।

1599 ई. में हबसियों ने बीड़ पर आक्रमण किया। बीड़ के अधिकारी शेरख्वाजा ने इसका वीरता से मुकाबला किया। शाही सेना की ओर से मेड़ता के शासक केशवदास व गोपालदास पराक्रम पूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इनके अलावा कई मेड़तिया काम बीड़ के युद्ध में मारे जाने के बाद गोपालदास का पुत्र जगन्नाथ और केशवदास का पुत्र कान्हादास गद्दी पर बैठे जिन्हें आधा-आधा मेड़ता मिला।


कान्हदास की 1604 ई. में मृत्यु के पश्चात् उसके हिस्से का आधा मेड़ता जगन्नाथ को दे दिया। किन्तु अहमदाबाद में 1609 ई. में उसकी भी मृत्यु होने पर मेड़ता राजा शूरसिंह जोधपुर को प्राप्त हुआ। इस प्रकार मेड़ता तो मेड़तियों के हाथ से निकल गया किन्तु परगने की जागीरों पर मेड़तियों का अधिकार बना रहा।

मेड़तिया राजपूतों ने जहाँ शाही सेना में रहकर कर्तव्यपरायणता का परिचय दिया वहीं ब्राह्मणों की रक्षार्थ अबू से संघर्ष किया और बलून्दा रामदास चांदावत व उनके पौत्र जैतसिंह मेड़तिया ने प्राणों की आहुती दी।

 
खानजहाँ लोदी द्वारा बादशाह शाहजहाँ के विरुद्ध विद्रोह में फरवरी 1630 ई. को राजा राजसिंह की सेना में मेड़तिया राठौड़ों की सेना का संचालन गिरधरदास केशवदासोत मेड़तिया ने किया। 1683 ई. में राजा गजसिंह की मृत्यु के बाद महाराजा जसवन्त सिंह को भी मेड़तिया राठौड़ों की अमूल्य सेवाएँ मिलती रही। मेड़तिया गोपालदास रीयां को जोधपुर का प्रधान नियुक्त किया गया जिन्होंने कंधार अभियान में भाग लिया था।

जयमल के वंशज रघुनाथसिंह मेड़तिया ने धरामात के युद्ध में औरंगजेब का साथ दिया था। बादशाह ने रघुनाथसिंह को मारौठ प्रदान किया। गौड़ राजपूतों को पराजीत कर मारौठ व आसपास के गाँवों पर रघुनाथसिंह ने अधिकार किया। रघुनाथसिंह को 1500 जात,900 सवार,500 दो अस्पा मनसब था।

 
मेड़तियों ने महाराजा जसवन्तसिंह के नेतृत्व में कोडोना (दक्षिण) व कपाड़ा के दरें में अफगानों से युद्ध किया। 28 जनवरी 1678 को पेशावर में देहान्त हो गया और उनकी रानियों ने दो पुत्रों अजीतसिंह एवं दलथंभन को 19 फरवरी 1679 को जन्म दिया। औरंगजेब ने अजीतसिंह को जोधपुर न देकर अमरसिंह नागौर के पौत्र इन्द्रसिंह को राज्याधिकार प्रदान कर दिया।

 

बादशाह के कपट विचारों का आभास होने पर बालक अजीतसिंह की रक्षा का भार उठाने में भी मेड़तिया राठौड़ पीछे नहीं रहे। भावी महाराजा की रक्षार्थ दिल्ली युद्ध में खरसिंह

 आलणियावास, मोहकमसिंह बलून्दा आदि कई मेड़तिया राठौड़ों ने अपना जीवन न्यौछावर किया ।

शाही आज्ञा से जब मेड़ता व आसपास के मन्दिरों को तोड़ा गया तो राजसिंह पुत्र ठाकुर प्रतापसिंह रीयां ने मेड़ता पर आक्रमण कर मुगलों को भगा दिया और मेड़ता की मस्जिदें तोड़ डाली। अगस्त 1679 में राजसिंह आलनियावास के नेतृत्व में मेड़तियों ने पुस्कर में मुगल सेना से युद्ध किया। वराह मन्दिर के सामने हुए इस घमासान युद्ध में राजसिंह के साथ रूपसिंह बेसरोली, गोकुलदास बीजीरूण, हठीसिंह नेणियाँ, केसरीसिंह (राजसिंह का भतीजा), आनंदसिंह रीयां अपने कतिपय योद्धाओं के साथ समरांगण में वीरगति को प्राप्त हुए। नवाब तहब्बर खाँ के साथ लड़ते हुए मेड़तियों, चांपावतों, उदावतों, जैतावतों व कच्छवाहा और भाटी योद्धाओं ने आत्मोसर्ग किया था।

 
महाराणा राजसिंह मेवाड़ ने अजीतसिंह जोधपुर को मेवाड़ में आश्रय प्रदान किया। औरंगजेब इससे नाराज हुआ और मेवाड़ पर 1679 ई. में आक्रमण कर दिया। शाही सेना जब देबारी घाटे में प्रविष्ट हुई तो बदनौर के कुञ्जयसिंह और सांवलदास मेड़तिया सहित कई मेड़तिया बन्धु युद्ध में काम आए जिनकी छत्रियाँ आज भी उनकी वीरती की गाथा कह रही हैं। गोपीनाथ घाणेराव ने मुगलों से बहुत युद्ध किये। इन्हीं के प्रयास से महाराणा जयसिंह एवं कुंवर अमरसिंह के बीच समझौता हुआ और राजपूत शक्ति नष्ट होने से बच गई।

सन् 1705 ई. में ठाकुर कुशलसिंह रीयां, विजैसिंह बलून्दा अपने सैनिकों सहित जालौर पहुँचकर शत्रु को पराजित कर भगा दिया और महाराजा अजीतसिंह के जीवन की रक्षा कर मेड़तियों ने स्वामी भक्ति का पूर्ण परिचय दिया।

मेड़तिया राठौड़ों के प्रमुख ठिकाने

1. घाणेराव-जि.पाली, गाँव 37, कुरव हाथ, दोवड़ी ताजीम, अव्वल अदालती अधिकार रेख     37600 रु. गोपीनाथ मेड़तिया राठौड़। सन् 1692 ई.में घाणेराव के ठाकुर           गोपीनाथ        मेड़तिया के प्रयासों से मेवाड़ के महाराणा जयसिंह व कुंवर के बीच      समझौता हो जाने से   राजपूत शक्ति हास होने से बच गई। गोपीनाथ घाणेराव ने मुगलों से अनेकों युद्ध लड़े थे।

2. आलणियावास-जिला नागौर, दोवड़ी ताजीम, अव्वल अदालती अधिकार, कुरब       हाथ,   गांव,4, रेख 13600 रु. साधोदासोत मेड़तिया। यह सिरायत ठिकाना था। जोधपुर के      बालक महाराजा अजीतसिंह के समय जब औरंगजेब बादशाह की सेना पुष्कर के मंदिरों का        विध्वंस          करने आई तब ठाकुर राजसिंह आलणियावास तीन दिन तक शत्रु सेना से घमासान युद्ध करते      हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

सन् 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम में यहाँ के ठाकुर अजीतसिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध देशी सेनाओं का साथ दिया था तथा उनके साथ पंजाब तक गये थे। अंग्रेजों ने आलणियावास पर अधिकार कर लिया तब ये शेखावाटी और बीकानेर इलाके में रहकर मारवाड़ पर हमले करते रहे थे। इनके पुत्र उदयसिंह के समय पुनः आलणियावास पर अधिकार हुआ।

3. रीयां-जिला नागौर, दोवड़ी ताजीम, अव्वल अदालती अधिकार, कुरब हाथ, गाँव-8, रेख36103 रु.। माधोदासोत मेड़तिया। यह भी सिरायत ठिकाना था। रीयां के ठाकुर   शेरसिंहजी बड़े वीर थे। जोधपुर महाराजा अभयसिंह की मृत्यु के समय प्राण नहीं निकल रहे थे तब शेरसिंह जी रीयां ने पूछा कि आपके क्या चिन्ता है। महाराजा ने  कहा कि मेरा लड़का  रामसिंह अयोग्य हे और मेरी मृत्यु के बाद मेरा भाई बख्तसिंह   जोधपुर का राज्य रामसिंह से  छीन लेगा। इस पर शेरसिंह ने प्रतिज्ञा की कि मेरे जीते जी जोधपुर पर उनका अधिकार नहीं होने दूंगा।  हुआ भी यही शेरसिंह के युद्ध में काम आ जाने के बाद ही बख्तसिंह का  जोधपुर पर अधिकार हो सका।

4. कुचामण-जि. नागौर, गाँव 15, रेख 42750 रु. दोवड़ी ताजीम, कुरब हाथ, अव्वल    अदालती अधिकार। गोयन्ददासोत मेड़तिया। स्व. राजा हरिसिंह जी बड़े योग्य व्यक्ति        थे। यह           मेड़तियों में सिरायत ठिकाना था।

कुचामन रघुनाथसिंह के खानदान में था। यहाँ के ठाकुर जालिमसिंह बड़े वीर थे। राजाधिराज बख्तसिंह नागौर और उनके भतीजे महाराजा रामसिंह जोधपुर के बीच जब युद्ध चला तब मेड़तिये रामसिंह के पक्ष में थे। एक युद्ध में जालिमसिंह मारे गये। उसके बाद बख्तसिंह और महाराजा गजसिंह बीकानेर की फौजे जोधपुर की तरफ बढ़ रही थी तो वर्षा के कारण तोपें काफी पीछे रह गई थी। गजसिंह ने तोपों को आगे लाने के लिए रुकने का प्रस्ताव किया तो बख्तसिंह ने कहा जालिमसिंह जैसे वीर के डर से तोपों को आगे रखना जरूरी था वे तो मारे जा चुके हें अब तोपें कहीं भी रहे कोई डर नहीं है। कुचामण हरिसिंह को महाराजा उम्मेदसिंह जोधपुर ने राजा की वंशानुगत पदवी प्रदान की थी।

 

5. चाणोंद-जिला पाली,गाँव26, कुरब हाथ, दोवड़ी ताजीम, अव्वल अदालती  अखतियार,    रेख 51000 रु.। गोपीनाथोत मेड़तिया। महाराणा रायमल जी ने अपने  दोहित्र प्रतापसिंह   वीरमदेवोत को यह जागीर प्रदान की थी।

6.बडू-जिला नागौर, दोवड़ी ताजीम, दूसरे नम्बर के अदालती अखतियार, गाँव 12  कुरब   हाथ रेख 32750 रु. केशोदासोत मेड़तिया। ठा. दलीपसिंह प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं    जो प्रधान भी  रह चुके हैं।

 

7. बूड़सू-जिला नागौर, दोवड़ी ताजीम, दूसरे नम्बर के अदालती अधिकार, गाँव 24,     कुरब   हाथ, रेख 37550 रु.। केशोदासीत मेड़तिया।

8. गूलर-जि.नागौर, दोवड़ी ताजीम,गाँव 5, रेख23250 । सुरताणोत मेड़तिया। 1857 में अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े थे।

9.जावला-जिला नागौर, दोवड़ी ताजीम, गाँव 81/2, कुरब हाथ, रेख 38000 रु.।   सुरताणोत मेड़तिया। ये जयमलजी के बड़े पुत्र सुरताण के वंशज हैं यह ठिकाना  मेड़तियों में टीकाई है।

10.भखरी-जिला नागौर, दोवड़ी ताजीम, कुरब हाथ,रेख 17000 रु.। सुरताणोत मेड़तिया। एक बार जयपुर महाराजा जयसिंह ने जोधपुर पर चढ़ाई की। अन्त में दोनों राज्यों में सन्धि हो गई और जयपुर की विशाल सेना वापस रवाना हुई। महाराजा जयसिंह ने पुष्कर स्नान करने का विचार किया। वापस लौटते हुए जयपुर वालों ने ताना मारा कि हमारी तोपें तो भरी ही जा रही हैं कोई खाली कराने वाला ही नहीं मिला। इस पर भखरी के ठा. केशरीसिंह ने अचानक हमला कर उस हाथी को पकड़ कर भखरी ले आए जिस पर महाराजा जयसिंह जयपुर के पूजन का सामान था। जोधपुर के महाराजा जिस सेना का मुकाबिला नहीं कर सके उसका छोटे से ठिकाने भखरी ने सामना किया। महाराजा जयसिंह ने दो दिन तक सेना व तोपें भेजी लेकिन वो भखरी के किले पर अधिकार नहीं कर सकी। महाराजा जयसिंह बिना पूजा के भोजन नहीं करते थे। तीसरे रोज स्वयं महाराजा अपनी सारी सेना के साथ भखरी पहुँचे तब जाकर किले पर अधिकार हुआ।
 [          भाग-1            भाग - 2              भाग - 3             भाग -4      ]
 
-लेखक - देवी सिंह मंडावा

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