शुक्रवार, जनवरी 13, 2017

मेड़तिया राठौड़ ( भाग - 1 )

मालवा व राजस्थान के राठौड़ों के आदीराव सीहा के मृत्यु स्मारक लेख से यह प्रमाणित होता है कि 13 वीं शताब्दी के मध्य में मारवाड़ में राठौड़ों का आगमन हुआ था। मंडोर के तीसरे शासक जोधा के पुत्र दूदा के वंशज मेड़तिया कहलाए। साथ ही ये दूदावत भी बोले जाते हैं। रावदूदा की सन्ताने मेडता नामक स्थान की शासक होने के कारण मेड़तिया राठौड़ कहलाये

जितना विस्तार मेड़तियों का हुआ उतना अन्य राठौड़ शाखाओं का नहीं हुआ। मेड़ता के अलावा परबतसर, नांवा, मारौठ,जैतारण, कौलियां, नागौर तथा दौलतपुरा परगने की करीब 600 जागीरें मेड़तियों के अधिकार में थी। राठौड़ों की उच्च शाखा मेड़तियों के विवाह सम्बन्ध सिसोदिया राजघराने में होने के कारण मेवाड़ के लिए मेड़तिया शूरवीरों ने अनेकों बार आत्मोसर्ग किया ।

राव दूदा

जोधपुर के संस्थापक जोधा के पुत्र दूदा का जन्म रानी सोनगरी चाँपा की कोख से 15 जून सन् 1440 ई. को हुआ। दूदा का बाल्यकाल संकटों में व्यतीत हुआ वह बचपन से ही चंचल एवं तेज स्वभाव के थे। दूदा की शिक्षा की अच्छी व्यवस्था की गई थी। विपत्तियों ने उनमें अनेक गुणों का विकास किया और कुछ ही समय में दूदा युद्ध विद्या में प्रवीण हो गए। जैतारण के स्वामी मेघासींधल के पिता द्वारा आसकरण शक्तावत (राठौड़) के वध का बदला लेने के लिए राव जोधा ने दूदा को भेजा। दूदा व मेघा सीधल के बीच एकाकी युद्ध हुआ। इसमें दूदा ने मेघा का सिर धड़ से अलग कर अपने रण चातुर्य की परीक्षा दी।

जोधपुर से 117 किमी. उत्तर-पूर्व में स्थित मेड़ता नगर को वरसिंह व दूदा ने आबाद किया। ऐसी पौराणिक मान्यता है कि मानधाता राजा ने उस नगर की स्थापना की थी। इसका प्राचीन नाम मेड़तपुर व मेड़न्तक था। 1318 ई. के बाद मेड़ता नगर उजड़ गया तथा वीरान पड़ा रहा जिसे वरसिंह व दूदा ने आबाद किया।

चैत शुक्ला 6 विक्रम सम्वत 1518 को कोट की आधारशिला रखी। वरसिंह औरदूदा ने उदा राठौड़ को अपना प्रधान नियुक्त किया। वरसिंह दूदा ने सांखलों से चौकड़ी, कोसाणां और मादलिया जीत कर अपने राज्य की वृद्धि की। इसके बाद दूदा अपने भाई राव बीका के पास बीकानेर चले गए जहाँ काफी समय तक रहे। बीकानेर के मार्ग में दूदा की भेंट सिद्ध पुरुष जाम्भोजी से हुई जिसने मेड़ता प्राप्ति का आशीर्वाद दिया।

हिसार के सूबेदार सारंगखाँ द्वारा राव बीका के चाचा कांधल को मार डाला गया। अतः राव जोधा, राव बीका और दूदा ने सारंगखाँ पर आक्रमण किया। सारंगखाँ युद्ध में मारा गया और उसकी सेना परास्त हुई। इस युद्ध में दूदा जी ने अद्भुत वीरता का प्रदर्शन किया था।

वरसिंह ने 1490 ई. में सांभर पर आक्रमण कर लूटा। सांभर के हाकिम मल्लू खां ने इसका बदला लेने का निश्चय किया और उपयुक्त समय पर मल्लू खां ने मेड़ता पर आक्रमण कर दिया। वरसिंह मेड़ता छोड़कर जोधपुर चला गया। मेड़ता को मल्लू खां ने लूटा और उसके सैनिकों ने गौरीपूजा के लिए जाती महिलाओं का अपहरण कर लिया। राठौड़ दूदा को जब इस घटना का पता लगा तो वह सेना सहित जोधपुर पहुँचे जहाँ से सातल, सूजा और वरसिंह और दूदा ससैन्य बीसलपुर पहुँचे। युद्ध कला के अनुभवी वरजांग भींवोत राठौड़ को अपने साथ मिला कर रात्रि के समय शत्रु सेना पर अचानक हमला कर दिया। मल्लू खाँ पराजित हुआ और मीर घुड़ला मारा गया। दूदा जी के पराक्रम व रण कौशल की इससे बड़ी ख्याति हुई। दूदा ने शत्रु सेना को चीरते हुए सारंग खां का पीछा कर उसका हाथी छीन लिया था।

मल्लू खां ने माण्डूके बादशाह से सैनिक सहायता प्राप्त कर कोसाणा की हार का बदला लेने के लिए मेड़ता पर आक्रमण कर दिया। वरसिंह जब समझोते के लिए अजमेर गया तो धोखे से मल्लू खां ने उसे बन्दी बना लिया। इसकी सूचना मिलते ही राव बीका और जोधपुर के राव सूजा की संयुक्त सेना ने चढ़ाई की जिसकी सूचना मिलते ही मल्लू खां ने सुलह कर वरसिंह को रिहा कर दिया। मल्लू खां ने अजमेर में वरसिंह को जहर दे दिया था। फलतः छ: माह बाद उसका देहान्त हो गया। वरसिंह का बड़ा लड़का सींहा मेड़ता का शासक बना जो अयोग्य एवं विलासी था। सींहा की मां ने दूदा को बीकानेर से बुला कर मेड़ता का शासन प्रबन्ध उन्हें सौंप दिया और आधी आय सींहा को देने का फैसला किया गया। इस प्रकार मेड़ता बचा लिया गया ।
 

दूदा ने सींहा की हरकतों को दो वर्ष तक देखा और सुधार न देखकर उसे रांहण भेज दिया और जागीर का पट्टा दे दिया। अब राव दूदा (सन् 1495 में) सारे मेड़ता का स्वामी बन गया। राव दूदा की मृत्यु की निश्चित तिथि तो प्राप्त नहीं हो सकी पर उसकी मृत्यु करीब 75 वर्ष की आयु में हुई।

 राव दूदा के पांच पुत्र थे। वीरमदेव मेड़ता का शासक बना। रायमल को रायण की जागीर प्राप्त हुई और उसके वंशज रायमलोत मेड़तिया कहलाए। तीसरा रायसल के वंशज रायसलोत मेड़तिया कहलाए। चौथा रतनसिंह को कुड़की का ठिकाना मिला। वह खानवा के युद्ध में रायमल के साथ वीरगति को प्राप्त हुआ। इसकी पुत्री भक्तिमती मीरां बाई राणा सांगा के पुत्र भोजराज से ब्याही गई। पांचवां पुत्र पंचायण जोधपुर के राव मालदेव की सेवा में रहा। पंचायण शरफुद्दीन की मेड़ता की चढ़ाई के समय अपने पुत्र जैतमल के साथ 1563 ई. में काम आया


राव दूदा मारवाड़ का एक महत्वपूर्ण सफल व्यक्ति था जो अपने साहस व दृढ़ संकल्प के कारण अपने समय का एक दुर्धष योद्धा माना गया।

राव वीरमदेव

दूदा का जयेष्ठ पुत्र राव वीरमदेव 1515 ई. में मेड़ता की गद्दी पर बैठा। वीरमदेव का जन्म 19 नवम्बर 1477 को हुआ। वीरमदेव निर्भीक एवं रणकुशल शासक था जिसका सम्बन्ध जोधपुर के राव मालदेव से कभी अच्छा नहीं रहा।

मेड़ता का पूर्व शासक सीहा रायण ग्राम में ही रहा किन्तु उसके पुत्र जैसा, गांगा तथा भोजा पराक्रमी थे अंतराल में मेड़ता प्राप्ति के प्रयास करने लगे। अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए वे मालदेव से मिले जिसने उनको वीरमदेव पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया। मालदेव अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध सैनिक सहायता न दे सका। सीहा के पुत्रों ने मेड़ता पर आक्रमण कर मेड़ता में लूटपाट की किन्तु वीरमदेव ने जब चढ़ाई की तो तीनों भाई-भाई गए और बुरी तरह जख्मी हुए, वीरमदेव विजयी हुआ। ईडर के शासक रायमल राठौड़ को गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह ने ईडर से निकाल दिया था और मुवारिजुलमुल्क को हाकिम नियुक्त कर दिया। रायमल राठौड़ मेवाड़ के राणा सांगा के पास गया और सहायता की मांग की। राणा सांगा ने जोधपुर के राव गांगा व मेड़ता के राव वीरमदेव की संयुक्त सेनाओं के साथ ईडर पर चढ़ाई की । मुवारिजुलमुल्क ईडर से भाग अहमदाबाद चला। ईडर पर अधिकार के बाद राणा सांगा अहमदनगर पर अधिकार कर वापस लौट आए।

 
17 मार्च सन् 1527 ई. को राणा सांगा और बाबर के बीच खानवा के युद्ध में मेड़ता के राव वीरमदेव का नाम विशेष उल्लेखनीय है। वीरमदेव के साथ उसके भाई रायमल तथा रतनसिंह सहित 5000 सैनिकों ने इस युद्ध में भाग लिया। राणा सांगा युद्ध में अचेतन हो गए थे तथा वीरमदेव उस युद्ध में घायल हो गए थे। रायमल तथा रतनसिंह मुगल सेना का संहार करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इसी रतनसिंह की एक मात्र सन्तान मीरांबाई थी।


वीरमदेव ने दो बार राणा सांगा के पक्ष में युद्ध में भाग लिया। राव वीरमदेव की

तत्कालीन स्वतन्त्र शासकों में शक्तिशाली शासक के रूप में गणना की जाती थी। यही नहीं वीरमदेव ने अपने भाई बन्धुओं व मित्रों एवं संगों को भी समय-समय पर सैनिक सहायता प्रदान की थी।

 
जोधपुर के राव गांगा की मृत्यु के बाद मालदेव गद्दी पर बैठा। उसने मेड़तिया राठौड़ों को समूल नष्ट करने का निश्चय कर लिया था। किन्तु उसके उमराव जैता एवं कुंपा स्वजातीय बन्धुओं से लड़ने के पक्ष में नहीं थे। कुंपा का वीरमदेव से मनमुटाव हो गया था किन्तु उसके मन में वीरमदेव के प्रति सम्मान में कमी नहीं आई थी।

गुजरात के बादशाह के सेनापति शमशेरुलमुल्क को वीरमदेव के हाथों पराजित होकर भागना पड़ा। यह युद्ध आलनियावास में हुआ था। वीरमदेव ने बिना विलम्ब ई. 1535 में अजमेर पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में ले लिया। राव मालदेव ने पाटवी के नाते अजमेर की मांग की किन्तु वीरमदेव ने मना कर दिया। इस पर मालदेव ने मेड़ता पर आक्रमण कर दिया। वीरमदेव अपने सरदारों के कहने पर अजमेर चला गया और मेड़ता पर 1536 ई. में मालदेव का अधिकार हो गया इसके बाद मालदेव ने अजमेर भी छीन लिया और वीरमदेव डीडवाना चला गया।

 
मालदेव की सेना के पीछा करने पर वीरमदेव नाण अमरसर शेखावाटी पहुंचे जहाँ राव रायमल शेखावत के पास साल भर रहे। इसके बाद ई. 1537 में चाटसू पर अधिकार कर लिया वहां से मालदेव की सेना द्वारा पीछा करने पर वीरमदेव क्रमश: लालसोट व बंवाली मौजाबाद चले गए। जैता और कुंपा बिना युद्ध किए ही बंबाली से वापस जोधपुर लौट आए। वीरमदेव मेड़ता पर पुनः अधिकार करना चाहता था। मालदेव ने बीकानेर के राव जैतसिंह को भी खत्म कर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था। जैतसिंह का पुत्र कल्याणमल सिरसा में रहन लगा। उसका मन्त्री नगराज शेरशाह सूरी की सेवा में गया। दूसरी ओर वीरमदेव भी रणथम्भौर के नवाब की मदद से शेरशाह के पास पहुंचा दोनों ने मालदेव पर चढ़ाई करने के लिए शेरशाह को तैयार कर लिया।

 
शेरशाह अपनी विशाल सेना सज्जित कर राव मालदेव पर चढ़ आया। राव वीरमदेव और राव कल्याणमल भी उसके साथ थे। यह सूचना मिलने पर मालदेव भी अपने प्रसिद्ध सेना नायक जैता, कूंपा, अखैराज सोनगिरा, जैसा चांपावत सहित सामने आ डटा। किन्तु दोनों ही पक्ष युद्ध की भयावहता से भयभीत हो एक माह तक आमने-सामने पड़ाव डाले पडे रहे। तब वीरमदेव ने छल की नीति अपनायी और मालदेव के सरदारों को सस्ती कीमत में ढ़ालें बिकवाने की योजना बनाई और उनकी गद्दियों में जालीपत्र व मोहरें भरवा दी।

 
इसकी जानकारी मालदेव तक पहुंचा दी गई कि आपके सरदारों को बादशाह ने अशर्फियों से खरीद लिया है। मालेदव ने जांच की तो अपने सरदारों पर सन्देह हो गया। वीरमदेव की इस कार्यवाही का किसी भी सरदार को पता नहीं चला। विस्वस्त सरदारों को बिना बताए ही मालदेव एक रात्रि को अन्धेरे में रणक्षेत्र से वापस लौट गया।

मालदेव के साथ अधिकांश सेना चली गई थी मात्र 10 हजार सैनिक व जैता-कूपा बचे थे। सुमेल के इस ऐतिहासिक युद्ध में वीरवर जैता,कूंपा, अखैराज सोनगरा आदि अन्तिम समय तक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हए। इस युद्ध में राजपूत सेना की बहादुरी व आक्रमण क्षमता को देख शेरशाह के मुंह से स्वयं ही ये शब्द निकले 'एक मुट्ठी बाजरे के लिए हिन्दुस्तान की बादशाही खो देता'। इस लोमहर्षक युद्ध के बाद वीरमदेव को मेड़ता पुनः प्राप्त हुआ।

 
इस प्रकार छ: वर्ष के संघर्ष के बाद मेड़ता पर वीरमदेव का अधिकार हुआ। मेड़ता के आस-पास के सभी ठिकानों पर मेड़तिया राठौड़ों ने पुनः अधिकार कर लिया। मेड़ता व बीकानेर के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित हो गए किन्तु मालदेव व मेड़तिया राठौड़ों के बीच पड़ी दरार ने भविष्य मे बड़ा रूप ले लिया। राठौड़ शक्ति दो भागों में विभक्त हो गई। एक ओर जोधपुर के शासक व उसके सामन्त तो दूसरी ओर मेड़ता व बीकानेर जिसका लाभ शत्रु को मिलना स्वाभाविक ही था।

 
राव वीरमदेव का देहान्त 66 वर्ष की आयु में फरवरी सन् 1544 में हो गया। वीरमदेव के 10 पुत्रों का विवरण प्राप्त है। जयमल यह वीरमदेव का ज्येष्ठ पुत्र था जो मेड़ता की गद्दी पर बैठा। दूसरा ईशरदास जिसके वंशज ईशरदासोत कहलाए। उन्हें आलणियावास का ठिकाना प्राप्त हुआ। जगमाल यह राव मालदेव की सेवा में रहे। इनके वंशज जगमालोत मेड़तिया कहलाए। सन् 1557 में मालदेव ने मेड़ात विजय कर आधा मेड़ता जगमाल को प्रदान किया। 1563 ई. में जगमाल पूरे मेड़ता का शासक नियुक्त किया गया था।

 
चाँदा ने बलूदा ग्राम बसाया वह स्वतन्त्र प्रकृति का वीर पुरुष था। जिसके वंशज चाँदावत मेडतिया कहलाए। बीका, इसके पुत्रों को सोजत व जैतारण में जागीर मिली। पृथ्वीराज के वंशज मेवाड़ में रहे। प्रतापसिंह को मेवाड़ में जनोद की जागीर मिली इसी के पुत्र गोपालदास को घाणेराव का ठिकाना प्राप्त हुआ। इसके वंशज गोपीनाथ से गोपीनाथोत शाखा चली। सारंगदेव इसे वणहड़ा में सोलंकी राजपूतों ने मार डाला था। मांडण, यह भी सारंगदेव के साथ मारा गया ।  ( आगे पढ़िये......)

[          भाग-1            भाग - 2              भाग - 3             भाग -4      ]
 
लेखक - देवी सिंह मंडावा

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