गुरुवार, जनवरी 19, 2017

रावत चूंडा

स्वामिभक्ति, शौर्य, पराक्रम, कर्तव्य परायणता और न्याय की प्रतिमूर्ति के रूप में चूंडा को जाना जाता है। मेवाड़ में चूंडा और उसके वंशजों की जो ख्याति आज तक है उसका कारण उनकी मातृभूमि के प्रति निष्ठा व ललक का होना है। बात-बात में एक पुत्र द्वारा अपने पिता के मनोभावों को पढ़कर अपने लिए आये सगाई का प्रस्ताव पिता के हक में त्याग देना और फिर राजगद्दी के हक को भी अत्यन्त सहजता से छोड़ देना केवल और केवल चूंडा जैसे बिरले का ही काम था। यही वे कारण थे कि वह सभी के सम्मान का पात्र बन गया। इस सम्बन्ध में राजस्थान के अनेक कलम धर्मियों व इतिहासकारों ने खूब लिखा हैं।
 

सुप्रसिद्ध इतिहासवेत्ता गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने चूडा का यह सम्पूर्ण वृतांत इस प्रकार प्रस्तुत किया है-'महाराणा (लाखा) की वृद्धावस्था में राठौड़ रणमल की बहिन हंसाबाई के सम्बन्ध का नारियल महाराणा के कुंवर चूंडा के लिए आया, उस समय महाराणा ने हंसी में कहा कि 'जवानों के लिए नारियल आते हैं, हम जैसे बूढ़ों के लिए कौन भेजे ?" यह बात सुनते ही पितृभक्त चूडा के मन में यह भाव उत्पन्न हुआ कि मेरे पिता के मन में विवाह करने की इच्छा है, इसी से प्रेरित होकर उसने राव रणमल से कहलाया कि आप अपनी बहिन का विवाह महाराणा से करदे। उसने इस बात को अस्वीकार करते हुए कहा कि महाराणा के ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण आप राज्य के उत्तराधिकारी है। अत: आपसे विवाह करने पर यदि मेरी बहिन के पुत्र उत्पन्न हुआ तो वह मेवाड़ का स्वामी बनेगा, परन्तु महाराणा के साथ विवाह करने से मेरे भांजे को चाकरी में निर्वाह करना पड़ेगा। इस पर चूंडा ने कहा कि यदि आपकी बहिन के पुत्र हुआ तो वह मेवाड़ का स्वामी बनेगा और मैं उसका सेवक बनकर रहूँगा। इसके उत्तर में रणमल ने कहा-मेवाड़ जैसे राज्य का अधिकार कौन छोड़ सकता है? यह तो कहने की बात है। तो चूंडा ने एकलिंग जी की शपथ खाकर कहा कि-मैं इस बात के लिए इकरार लिख देता हूँ, आप निश्चिंत रहिए। फिर उसने अपने पिता के विरुद्ध आग्रह करके उनको नई शादी हेतु बाध्य किया और इस आज्ञा का प्रतिज्ञा पत्र लिख दिया कि यदि इस विवाह से पुत्र उत्पन्न हुआ तो वह राज्य का स्वामी होगा महाराणा ने हंसाबाई से विवाह किया जिससे मोकल का जन्म हुआ।"
 

चूंडा द्वारा सत्ता त्याग के बारे में राजस्थानी गीतों, बड़वों व राणीमंगों की पोथियों में कुछ अलग-अलग रूप में मिलता है। सभी में चूंडा की प्रशंसा की गई, करें भी क्यों नहीं ऐसा उदाहरण और है कहाँ ? तभी तो जय माँ राठौड़ कल्याण संस्थान द्वारा प्रकाशित 'राजस्थान के सूरमा' में श्रीमती मायासिंह कुनाड़ी ने एक कवि की इन सुन्दर पंक्तियों के माध्यम से कहा कि चवरी चढ़ लाखो फिरे, फिरे बीनणी लार। चूंडा री कीरत फिरै, सात समुंदरा पार। सत्ता-त्याग के अतिरिक्त चूडा ने आगे भी वह किया, जो बहुत कम लोग ही कर सकते हैं। हंसाबाई और लाखा के इस विवाह के तेरह माह बाद राजकुमार मोकल का जन्म हुआ। लेकिन कुछ समय पश्चात ही महाराणा लाखा का स्वर्गवास हो गया। वीर विनोद के अनुसार पति के निधन के बाद सती होने को उद्धत हुई और हंसाबाई ने चूंडा को बुलाकर पूछा कि तुमने मेरे पुत्र के लिए कौनसा परगना देने की सोची है? इस पर चूंडा ने कहा-'हे माता, आपका पुत्र मेवाड़ का मालिक है और मैं उसका सेवक हूँ, आपको अभी सती नहीं होना चाहिए, आप तो राजमाता बनकर रहें।
 
चूंडा ने मोकल को चित्तौड़ के सिंहासन पर आरुढ़ कर सर्वप्रथम नज़र दिखलाई की रस्म निभाई  व मोकल के लिए सत्ता का परित्याग कर चूंडा ने अपने वचनों का निर्वाहन करते हुए मेवाड़ का राज्य प्रबन्ध-कार्य करने लगा। इसके प्रशासन के अधीन मेवाड़ में सुव्यवस्थित शासन चलने लगा। वीर विनोद (पृष्ठ310, भाग-1) में श्यामलदास चूंडा की प्रशंसा करते हुए लिखते हैं-चूंडा बहुत लायक और बहादुर सरदार था, वह हर तरह से न्याय कर अपनी प्रजा को खुशहाल रखता था। उसके अच्छे प्रशासन-प्रबन्धन के कारण राज्य और प्रजा दोनों सुदृढ़ हुए।
 
मेवाड़-त्याग-कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति अच्छा कार्य करता है तो भी कुछ स्वार्थों से बंधे ऐसे लोग भी होते हैं जिन्हें उसके अच्छे कार्य नहीं भाते हैं। ऐसा ही कुछ चूंडा के साथ भी हुआ। उसके रहते सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन कतिपय सरदारों को ठीक नहीं लग रहा था। वे अपने को सुतावस्था में पा रहे थे। वे अपनी बहन के रहते मेवाड़ पर हावी होना चाहते थे, लेकिन जब ऐसा हुआ तो रणमल आदि ने हंसाबाई के कान भरने शुरू कर दिये। अंतत: हंसाबाई के मन में यह बिठाने में सफल हो गये कि अभी तो सब कुछ ठीक चल रहा है लेकिन चूंडा अवसर मिलते ही मोकल को पद्च्युत कर स्वयं मेवाड़ की राजगद्दी पर आसीन हो जायेगा। अपने बाल-पुत्र के मोह में हंसाबाई को राठौड़ सरदारों की बात ठीक लगी और एक दिन चूंडा को बुलाकर कहा-'या तो तुम मेवाड़ छोड दो या जहाँ तुम चाहो वहाँ मैं अपने पुत्र सहित चली जाऊँ।"
 

चूंडा को सब कुछ समझने में देर नहीं लगी और उसने तत्काल राज्य प्रबन्ध और मोकल की रक्षा का दायित्व अपने भाई राघवदेव को सौंपकर मेवाड़ राज्य की सीमा त्याग कर मांडू के सुल्तान होशंगशाह के पास चला गया।  सुल्तान चूंडा से बहुत पहले से प्रभावित तो था ही, उसने चूंडा का यथोचित सम्मान किया और 42 लाख का मंदसौर का पट्टा जागीर में दिया तथा रावत की उपाधि प्रदान की। इसके पश्चात् रणमल ने षड़यंत्रपूर्वक चूंडा के भाई राघवदेव की हत्या करवा दी और मेवाड़ पर अपना वर्चस्व बढ़ाने के निमित्त प्रमुख पदों पर राठौड़ सरदारों को बिठा दिया। इसी बीच रणमल ने मेवाड़ी सेना के सहयोग से अपने मंडोर पर विजय प्राप्त करली। अब वह अधिकतर मंडोर ही रहने लगा जिसके कारण मेवाड़ में भी यहाँ के चाचा व मेरा नामक पासवानिया पुत्रों का जोर बढ़ गया और मौका देखकर एक दिन मोकल की हत्या कर दी।


राव रणमल की जब महाराणा मोकल की हत्या की सूचना मिली तो उसने तत्काल चित्तौड़ आकर मोकल के पुत्र कुंभा को गद्दी पर बिठाया और शासन प्रबन्ध पुन: अपने हाथों में ले लिया। रणमल को लगा कि मेवाड़ की आन्तरिक स्थिति ठीक नहीं है तो वह मेवाड़-मारवाड़ को एक करने के षड़यन्त्र में लग गया। और वह मोकल के उत्तराधिकारी कुंभा को रास्ते से हटाने में लग गया। एकदिन नशे में रणमल ने अपने मन की बात अपनी प्रेमिका भारमली से कह दी तो भारमली जो प्रेमिका तो रणमल की थी लेकिन थी मेवाड़ की माटी में जन्मी मेवाड़ की बेटी। उससे रहा नहीं गया और उसने वह बात राजमाता को बतादी।
 
 इस सम्बन्ध में 'सलूम्बर का इतिहास' की विद्वान लेखिका विमला भण्डारी ने पृष्ठ 29 पर लिखा है कि राजमाता के नाम पर मतभेद है। ग्रंथों में कहीं राजमाता सौभाग्यदेवी व कहीं राजदादी हसाबाई का उल्लेख मिलता है।  जो भी हो लेकिन इस प्रसंग में भारमली की भूमिका अहं थी जिसके कारण मेवाड़ रणमल के हाथों में जाने से बच गया। विमला भंडारी ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि राजमाता को इस संकट की घड़ी में चूंडा की याद ही आई और राणा कुंभा की सहमती पर एक पत्र लिखा, उसमें लिखा था-"तुम्हारे पिता का राज्य जाता है, अब यह कागज पढ़ते ही आओ और तुम ही इस राज्य को सम्भालो, नहीं तो कहोगे कि कैसी कुघराने की आई जिसने सीसोदिया का राज्य गवा दिया।'
 

चित्तौड़ के समाचार पाते ही चूंडा अपने कर्तव्य-निर्वहन के लिए मेवाड़ की और कूच कर गया। रणमल को जब पता लगा तो उसने बहुत विरोध किया लेकन स्थितियां बदल चुकी थी। पूर्व योजना के अनुसार एक दिन भारमली ने रणमल को जमकर शराब पिलाई और जब वह पूर्ण नशे में डूब गया तो नरबद और उसके साथियों ने रणमल का काम तमाम कर दिया।
 

रणमल की मृत्यु का समाचार तेजी से चित्तौड़ के किले पर और नीचे तलहटी में ज्योंही पहुँचा रणमल का पुत्र जोधा अपने साथियों के साथ वहाँ से भाग निकला। चूंडा ने उसका पीछा मंडोर तक किया लेकिन अंतत: वह जान बचाने में सफल रहा मगर मंडोर उसके हाथ से निकल गया और मेवाड़ के हाथों में आ गया।

चूंडा ने रणमल के सफाये के बाद मेवाड़ की सीमाओं का खूब प्रसार किया। कई छोटे-बड़े युद्धों में सफलता प्राप्त की। बाद में मंडोर पर भी जोधा का अधिकार तब हुआ जब राजदादी हंसाबाई के कहने पर कुंभा की मौन स्वीकृति हुई। ऐसे में चूंडा शांत रहा। चूंडा ने महाराणा के कार्यों में दखल न देने की सौगंध जो ली थी।
 

रावत चूंडा ने राज्य के अपने हक को त्यागकर  अपने वचन का निर्वहन जिस तरह किया वह न केवल राजस्थान के इतिहास में बल्कि सम्पूर्ण विश्व के इतिहास में एक ऐसा स्वर्णिम अध्याय है, जो सदैव अविस्मरणीय रहेगा। राजत्याग और फिर वचनानुसार अपने छोटे भाई को राजगद्दी पर आसीन करना तथा उसके राज्य की रक्षा हेतु निरन्तर लगे रहने को देखकर तत्कालीन एवं बाद के कई कलमधर्मियों द्वारा चूंडा के लिए जितना लिखा गया वो और किसी के लिए फिर नहीं लिखा गया। चूंडा पर लिखी पंक्तियां तो आज भी जन-मानस के मुँह पर सहज ही आ जाती है कि
लाखा स्वर्ग सिधारता, मोकल बांधी पाग।
चित्रकूट रक्षा कारण, चूंडा बांधी खाग।
 

पुत्र की ऐसी पितृभक्ति देख महाराणा लाखा ने यह नियम पारित किया कि मेवाड़ राज्य की ओर से जो पट्टे-परवाने जारी हो उस पर भाले था अंकन चूंडा और उसके पाटवी वंशज ही करेंगे। कहने का तात्पर्य है कि चूंडा ने राज्याधिकार भले ही छोड़ दिया था किंतु मेवाड़ उसके त्याग और तत्पश्चात् राज्य की सुरक्षा हेतु उसके द्वारा किये गये प्रयासों को नहीं भूल सका। चूंडा का सुयश आज भी चिर अमर है और आगे भी वह अमर ही रहेगा।
 

 (लेखक तेजसिंह तरुण राजस्थान के सूरमा” ) 
 
 

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