मंगलवार, जनवरी 31, 2017

उड़ना पृथ्वीराज

अब तक मेवाड़ की कोख से जन्म राणा कुंभा राणा सांगा और राणा प्रताप को ही सब ने पढ़ा और सुना किन्तु इसी वंश में एक और महान् पराक्रमी प्रतिभा हुई जो पृथ्वीराज के नाम से इतिहास के अदृश्य पृष्ठों में विख्यात है। पृथ्वीराज राणा रायमल के सब से बड़े पुत्र थे।

 पृथ्वीराज ने बड़े कुंवर होने के नाते प्रारम्भ से ही मेवाड़ पर होने वाले तत्कालीन अनेक संकटों में अपने पिता की सहायता की और मेवाड़ का मान बढ़ाया। पृथ्वीराज शत्रु से कभी भी नम्रता पूर्वक बातचीत करने में विश्वास नहीं रखता था। पृथ्वीराज ने अभी युवावस्था में पैर रखा ही था। उस समय मेवाड़ को मांडू का सुल्तान गयास शाह आये दिन परेशान कर रहा था। एक दिन मेवाड़ के महाराणा सुलह की बात के लिये सुल्तान के एक दूत से बातचीत कर रहे थे, भाग्य से कुंवर पृथ्वीराज वहां जा पहुँचा। महाराणा को इस प्रकार सुलह व नम्रतापूर्वक बातचीत करते हुए देखकर वह कुद्ध हुआ और उसने अपने पिता से कहा कि क्या आप मुसलमानों से दबते हैं कि इस प्रकार नम्रता पूर्वक बातचीत कर रहे हैं? सुल्तान के दूत ने इसे अपमान समझा और वह वहां से उठ कर मांडू के सुल्तान के पास गया और उसे भड़का कर एक सेना सहित चित्तौड़ पर चढ़ आया। पृथ्वीराज ने अपने पिता की ओर से सुल्तान की सेना का सामना किया और ख्यातों के अनुसार वह सफल हुआ तथा सुल्तान को कैद कर लिया। यहीं से पृथ्वीराज के पराक्रम व शौर्य का प्रकाश बिखरने लग गया। इसके बाद भी पृथ्वीराज ने मेवाड़ पर आये अनेक संकटों में अपने असीम बाहुबल का परिचय दिया।

 किन्तु विधाता को भला यह कहां मंजूर था कि यह महाबली पृथ्वीराज दो घड़ी विश्राम से बैठ जाये, उसका जीवन तो संघर्ष की माटी से बना था।

 एक दिन पृथ्वीराज व संग्रामसिंह दोनों ही अपनी अपनी जन्म पत्रियाँ ज्योतिषी को दिखला रहे थे। दुर्भाग्य से ज्योतिषी ने महाराणा बनने के ग्रह संग्राम के दिखलाये, इस पर पृथ्वीराज ने वहीं सांगा पर एक प्रहार किया, जिससे सांगा एक आंख को सदैव के लिये खो बैठे। दोनों राजकुमारों का यह संघर्ष एवम् द्वेष बढ़ता ही गया। एक दिन पुन: जब दोनों तलवारों से भिड़ रहे थे। उनके काका सारंगदेवोत ने उन्हें रोकना चाहा किन्तु पृथ्वीराज की तलवार को सांगा की जगह सारंगदेवोत ने अपने ऊपर झेली जिससे वह घायल हुआ। इसके बारे में एक दोहा अभी भी राजस्थान में प्रसिद्ध है

पीथल खग हाथां पकड़, वह सांगा किय वार।
सारंग झेले सीम पर, उणवर साम उबार।

उपरोवत संघर्ष में सांगा और पृथ्वीराज दोनों ही घायल हुए, मगर इसके उपरान्त राणा रायमल ने पृथ्वीराज को कहला भेजा कि-'दुष्ट, मुझे मुंह मत दिखलाना क्योंकि मेरी विद्यमानता में तूने राज्य लोभ से ऐसा क्लेश बढ़ाया और मेरा कुछ भी लिहाज न किया।

 
पृथ्वीराज लजित होकर कुम्भलगढ़ में जाकर रहने लगा, किन्तु उसके पराक्रम की कहानी को पूर्ण विराम नहीं लगा।

 एक बार जब उसने राणा की शरण में आये टोडा के सोलंकी हरराजोत की पुत्री ताराबाई के सौन्दर्य के बारे में सुना तो वह विवाह करने को तैयार हो गया। किन्तु विवाह से पूर्व हरराजोत की एक शर्त थी कि तारा से विवाह करने वाले को ललाखों से लड़कर पुन: पूर्वजों की जागीर टोडा को मुझे दिलाना होगा। पृथ्वीराज इसके लिये सहर्ष तैयार हो गया और उसने तुरन्त एक सेना लेकर लल्ला खां पर चढ़ाई कर दी। बहुत वीरता पूर्वक ललाखां और उसके मित्र अजमेर के सूबेदार मत्लू खां की संयुक्त सेना को पराजित कर टोडे का राज्य राव हरराजोत को दिला दिया तथा तारा के साथ विवाह किया। लला खां के साथ हुऐ युद्ध के सम्बन्ध में प्राचीन पद्य प्रसिद्ध है :-

भाग लल्ला पृथ्वीराज आयो
सिंहरे साथ रे, स्याल ब्यायो।

उपरोक्त पद्य से ही प्रतीत होता है कि पृथ्वीराज का आतंक उस समय कितना अधिक छाया हुआ था। वास्तव में पृथ्वीराज एक महान् साहसी पुरुष था। सारंगदेव से पृथ्वीराज का बैर प्रारम्भ से ही था। फलस्वरूप पृथ्वीराज ने राणा से सारंग देव को भैंसरोड़गढ़ की दी हुई जागीरी का विरोध किया तो राणा ने कहा कि 'हमने तो दे दी, अगर तुम ले सको तो ले लो।इस पर पृथ्वीराज ने 2000 की सेना लेकर भैंसरोड़गढ़ पर आक्रमण कर दिया। सारंगदेव पृथ्वीराज के शौर्य से परिचित था ही, वह किले से भाग निकला और बून्दी के राव सूरजमल से जा मिला। सूरजमल इस समय महाराणा से नाराज था और उसने मेवाड़ के कई सारे भाग पर अधिकार कर रखा था।

 महाराणा रायमल सूरजमल के आतंक से परेशान थे। उनकी इस परेशानी को दूर करने के लिये किसी ने कमर नहीं बांधी किन्तु पृथ्वीराज ने सूरजमल को मारने का बीड़ा उठाया। जैसा कि 'हरिभूषण महाकाव्य' में पाया जाता है कि महाराणा रायमल ने एक दिन दरबार में कहा कि महाबली सूर्यमल के कारण मुझ को इतना दु:ख है कि उसके जीते जी मुझे यह राज्य भी प्रिय नहीं है। उसके इस कथन पर जब कोई सरदार सूर्यमल को मारने को तैयार न हुआ तो पृथ्वीराज ने उसको मारने का बीड़ा उठाया। महाकाव्य में दी हुई पंक्तियां इस प्रकार है :-

तदात्मजो महावीर: पृथ्वीराजो रणागुणी : ।
तेनोत्थाय नमस्कृत्य बीटिका याचिता ततः ॥ 27
अवश्य माखीयां में सूर्यमल्लो महाबली।
निराधारो पि नालिकः सापथ्तो ........ ।28। (सर्ग 2)

महाराणा ने पृथ्वीराज के इस साहसी कदम पर बहुत प्रसन्नता व्यक्त की। पृथ्वीराज ने सूर्यमल से टकराने के लिये तैयारियां करना शुरू कर दी। कुछ ही समय में सूर्यमल व सारंगदेव मान्डू के सुल्तान की सहायला लेकर मेवाड़ पर चढ़ आये। पृथ्वीराज ने डटकर मुकाबला किया और सन्ध्या होने पर जब कि सेनायें अपने अपने पड़ाव में लौट गई थी, वह सूर्यमल के डेरे पर निडर हो पहुंचा और दोनों काका-भतीजे के मधुर वार्तालाप के अन्त में पृथ्वीराज यह कह कर पुन: लौट आया कि-'काकाजी, स्मरण रखिये कि मैं आपको भाले की नोंक जितनी भूमि भी न रखने ढूंगा।'

 उपरोक्त उदाहरण से यह स्पष्ट है कि सूर्यमल और पृथ्वीराज में जहां स्पर्धा थी, वहीं प्रेम भी था। सूर्यमल जब चित्तौड़ की लड़ाई में परास्त होकर बाठेड़ा

 चला गया पृथ्वीराज ने उसका पीछा किया और वह रात के समय ही बाठेड़ा जा पहुंचा। सूर्यमल अपने कुछ साथियों सहित पृथ्वीराज की पहुंच के समय ताप रहा था। पृथ्वीराज सूर्यमल के डेरे में सेना सहित घुस गया। युद्ध शुरू हो गया। पृथ्वीराज को पास आते देखकर सूर्यमल ने कहा-'कुंवर, हम तुम्हें मारना नहीं चाहते हैं, क्योंकि तुम्हारे मारे जाने पर राज्य डूबता है, मुझ पर तुम शस्त्र चलाओ।" यह सुनते ही पृथ्वीराज ने लड़ाई बन्द करवा दी और घोड़े पर उतर कर सूरजमल से पूछा-'काकाजी, आप क्या कर रहे थे।सूरजमल ने उत्तर दिया-'हम तो यहां निश्चिन्त होकर ताप रहे थे।इस पर पृथ्वीराज तपाक से बोला,-'मेरे जैसे शत्रु के होते हुए भी क्या आप निश्चिन्त रहते हैं?" सूरजमल इस चुनौती भरे वाक्य को सुनकर कुंवर पृथ्वीराज की सूरत निहारने लगा।

 पृथ्वीराज के उपरोक्त वाक्य में झलकने वाले आत्मविश्वास ने ही आगे चलकर सूरजमल को मेवाड़ छोड़ने के लिये मजबूर किया। पृथ्वीराज की निष्कपटता एवम् निडरता का एक और उदाहरण हमारे सामने है जो महाभारत की याद दिलाता है। जब सूरजमल बाठेड़ा से भागा और सादड़ी पहुंचा, पृथ्वीराज भी पीछे-पीछे सादड़ी गया और वहां सूरजमल से मिलकर अन्त: पुर में गया, जहां उसने अपनी काकी से मुजरा करके कहा, "मुझे भूख लगी है।सचमुच कितना निश्च्छल मन था। उस पृथ्वीराज का जिसने सूरजमल को युद्ध के मैदान में सदैव शत्रु समझा, किन्तु उसके बाद उसने उसी शत्रु को अपने परिवार का ही एक प्रिय व्यक्ति माना, साथ-साथ खाना खाता और रात में पारिवारिक बातें किया करता था। ऐसे विशाल हृदय वाला पृथ्वीराज नीति के प्रश्न पर सदैव नीति से ही काम लेता था। जब उसने सुना कि भुवा रमाबाई को पति (राजा मंडलिक) के बदचलन होने के कारण दु:ख है तो उसने तुरन्त गिरनार (गुजरात) सेना सहित ग्रस्थान किया और महल मे सोते हुए मंडलिक को जा दबोचा। मंडलिक प्राण भिक्षा मांगने लगा, जिस पर उसने उसके कान का एक कोना काट कर उसे छोड़ दिया और रमाबाई को अपने साथ ले आया। ऐसा ही सिरोही के राव जगमाल, जो पृथ्वीराज की बहिन आनन्दाबाई को दु:ख दिया करता था, को ठीक किया किन्तु राव जगमाल ने जहां अपने वीर साले का बहुत सत्कार किया, वहीं सरल हृदय पृथ्वीराज को लौटते समय विष मिली गोलियां खिला दी, जिसके कारण कुंभलगढ़ के निकट पहुंचने पर उसका देहान्त हो गया।

 इस प्रकार यदि मेवाड़ का यह महा पराक्रमी कुंवर पृथ्वीराज कुछ समय और जीवित रह जाता तो पता नहीं मेवाड़ के इतिहास में वीरता के और कितने पृष्ठ जुड़ते ? नैणसी ने तो अपनी ख्यात में इसे उड़ना पृथ्वीराज कहकर लिखा है। पृथ्वीराज की वीरता तो इसी में प्रकट हो जाती है कि बाबर जैसे व्यक्ति द्वारा मान्य शक्तिशाली सांगा भी पृथ्वीराज के हाथों पराजित होकर कई वर्षों तक मेवाड़ के बाहर दर-दर की ठोकरें खाता फिरा। जब तक पृथ्वीराज जीवित रहा, सांगा की मेवाड़ में आने की हिम्मत नहीं हुई। सांगा मेवाड़ में तब ही आया जब पृथ्वीराज को विधाता के कूर हाथों ने इस पावन धरती से छीन लिया था।

 
संक्षेप में यह कहना ही उचित होगा कि   सचमुच उसकी   भुजाओं में भीम   का बल, मन में अभिमन्यु सा आत्मविश्वास, और रगों में अपने ही वंशजों की यशमय स्फूर्ति भरी थी।  इतिहासकारों ने उसे राणा के पद पर आसीन न हो   सकने के कारण ख्याति   नहीं दी। अगर वह सांगा की  जगह  राणा होता  तो मेवाड़ के इतिहास में शायद ही   और कोई राणा   शौर्य और पराक्रम में   पृथ्वीराज की समानता करता।

(“राजस्थान के सूरमा “ ,लेखक – तेज़सिंह तरुण)



 


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