मंगलवार, जनवरी 24, 2017

राव बीकाजी

जब भी मरुधरा का नाम स्मृति-पटल पर आता है तो सहज ही एक नाम उभर कर आता है और वह है बीकानेर और उसके संस्थापक राव बीकाजी का। बीकाजी जोधपुर के शासक जोधा के ज्येष्ठ पुत्र थे। बीकाजी का जन्म विक्रम संवतू 1495 सावण सुदी 15 तदनुसार दिनांक 5 अगस्त, 1438 ईस्वी को हुआ था। राव जोधा के छ: रानियों से 17 पुत्र थे। बीकाजी उनमें सबसे बड़े पाटवी युवराज थे किंतु जोधाजी अपनी हाड़ी रानी जसमादे के पुत्र सातल को जोधपुर की राजगद्दी पर बिठाना चाहते थे। एक बार बात ही बात में जोधा ने बीका को कह भी दिया कि बाप का राज बेटा भोगे इसमें कोई आश्चर्य नहीं है, परन्तु जो बेटा नया राज्य स्थापित करे, वही बेटों में प्रमुख होता है।

 
बस, अब क्या था। बीकाजी को पिता की बात समझ में आ गई और मन में एक नये राज्य की स्थापना का विचार जोर पकड़ने लगा। इससे पहले कि बीका जोधपुर राज्य का त्याग करे, बात उनके भाइयों व मामा नापा सांखला आदि तक भी पहुँच गई। नापा सांखला मरुप्रदेश के इतिहास में एक प्रसिद्धि प्राप्त विचक्षण बुद्धिमान पुरुष माना गया है और जोधा के संकटकाल में कई बार सहायक सिद्ध हुआ। यही कारण था कि जोधा भी नापा को साले की तुलना में एक विश्वस्त मित्र के रूप में अधिक मानते थे। अत: उसने अवसर देखकर अपने बहनोई से बीका की जगह सातल को राजगद्दी देने के सन्दर्भ की बात कर ही ली। नापा ने जोधा से अनुरोध किया कि यदि आप सातल को युवराज-पद देना चाहते हैं तो प्रसन्नता पूर्वक देवें, किंतु बीकाजी को सैनिक सहायता सहित सारूंडे का पट्टा दे दीजिये, उनके भाग्य में होगा तो वह अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लेंगे।

 
राव जोधा ने नापा की इस सलाह को प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार कर ली और पचास सवार मय सारुंडे के पट्टे के उसी समय आदेश दे दिया। बस, अब क्या था? बीका द्वारा जोधपुर छोड़ने की बात सर्वत्र फैल गई। बीका अपने काका कांधलजी, रूपाजी, मांडलजी, नंदाजी(जोधाजी के सगे भाई) और नापा सांखला, वेला पड़िहार, वैद्य लाला लखनसी, चौथमल कोठारी, बरसिंह बच्छावत, विक्रमसी पुरोहित और सालूजी राठी आदी प्रमुख सरदारों व उनके सौ सवार व दो सौ पैदल सैनिकों के साथ आसोज सुदी 10, संवत 1522 (सन् 1465 ई.) में जोधपुर से कूच किया। मंडोर होते हुए देशनोक करणी माता की सेवा में उपस्थित हुए और यहां से बीकाजी अपना लक्ष्य साधने में लगे रहे। करणीमाता के बीकाजी पास ही में स्थित चांडासर में रहने लगे। कुछ ही समय में अपनी शक्ति में वृद्धि करते हुए कोडमदेसर और जांगलू क्षेत्र में अपना पूर्ण वर्चस्व जमा लिया और वि.सं. 1529 में 'राजा' पद से विभूषित हो गये। इस समय तक सांखलों के 84 गाँव बीकाजी के अधीन हो गये थे।

 
बीकाजी एक नये राज्य की स्थापना में तो सफल हो गये लेकिन जांगलू क्षेत्र के आसपास के भाटी सरदार और जाट शक्ति की चुनौतियां खड़ी थी। ऐसे ही कुछ दूरी पर भट्टी मुसलमानों का कब्जा था। सुजानगढ़ के आग्रेय सीमा पर मोहिल राजपूतों का अधिकार था। इन सबसे निपटना आसान नहीं था। सौभाग्य से इसी समय पास के ही पूंगल के भाटी राव शेखोजी को सुलतान की फौज ने गिरफ्तार कर लिया। जब इस घटना का बीकाजी के मामा नापा सांखला को पता लगा तो वह पूंगल गया और सहयोग का हाथ बढ़ाया। शेखोजी की बेटी रंगकंवर का हाथ बीकाजी के लिए मांगा और विवाह पका करालिया। ऐसा भी कहते हैं कि राव शेखा जब सुल्तान की कैद में थे, उसकी ठकुरानी करणी माँ के पास प्रार्थना लेकर गई। माँ करणी ने उसकी पुत्री रंगकंवर का हाथ बीका के लिए मागा। ठकुरानी के मान लेने पर लम्र का दिन भी निश्चित कर दिया। ऐसा माना जाता है कि लम्र के दिन स्वयं करणी माँ मुल्तान गई और शेखा को कैद से छुड़ाकर पूंगल लाई। शेखा को सारी बात बताई और कन्यादान कराया। तवारीख बीकानेर ने भी इस घटना की पुष्टि की है। पारिवारिक सम्बन्ध स्थापित होने के कारण बीकाजी को अब इस क्षेत्र में एक सहयोगी और मिल गया।

 
बीकाजी  अब कहाँ शांत   बैठने   वाले थे।   उन्होंने   कोडमदेसर में किला बनाना  शुरू किया लेकिन आसपास के भाटी सरदारों ने जमकर विरोध किया। भाटी कलिकर्ण एक बड़ी सेना के साथ बीकाजी पर चढ़ आया। बीकाजी को भी अन्देशा तो था ही। दोनों में धमासान हुआ। अन्ततः विजयश्री बीकाजी को मिली लेकिन भेरुजी के पवित्र स्थान पर रक्तपात और भाटियों
से सदा का वैर मोल लेना ठीक नहीं लगा और उन्होंने कोडमदेसर में किले के निर्माण का विचार त्याग दिया।


 

बीकाजी के उत्त विचार ने इस क्षेत्र में उन्हें स्थायित्व दिया और शीघ्र ही करणीमाता के निर्देशानुसार और उन्हीं के कर कमलों से वर्तमान बीकानेर के किले की नींव 1542 ई. में रखी गई जिसकी प्रतिष्ठा विक्रम संवत 1545, बैसाख सुदी 2, शनिवार (सन् 1488 ई.) को कराई गई। इस किले को आज जूनागढ़ के नाम से जानते है। जो बीकानेर का मूल स्थान है। चूरू निवासी खेमराजश्री कृष्णदास द्वारा बम्बई में स्थापित श्री वेंकटेश्वर प्रेस से प्रकाशित 'बीकानेर राज्य का इतिहास' में पृष्ठ 21 पर किले में 'भाडासर नाम से प्रसिद्ध मन्दिर होने का उल्लेख किया है जो संवत् 1525 ई. का बना हुआ है। इससे यह प्रतीत होता है कि किले की पहाड़ी पर अथवा इसके नीचे आज जहाँ बस्ती है, पूर्व में भी एक अच्छी खासी बस्ती रही होगी, जिसका बीकाजी ने किले का निर्माण करवाकर अपने नाम से नामकरण किया।

 
कुछ भी हो बीकाजी ने करणीजी की कृपा से अपना लक्ष्य साध ही लिया। इस सफलता में काका कांधल व बीदा के सहयोग को नहीं भूला जा सकता है। जोधपुर से साथ आये अन्य सरदारों ने भी बीकाजी के साहस एवं धैर्य को बनाये रखने में पूरा-पूरा योगदान किया जो राजपूत इतिहास में अप्रतिम उदाहरण है, तभी तो जांगलू क्षेत्र में बरसों तक ये पंक्तियां गूंजती रही कि कांधल बांके वीर रो, सीधो सरल सुभाव। भूपति कियो भतीज नै, आप रहयो उमराव। बीकाजी नये राज्य के राजा तो बन गये किंतु उनके सम्मुख अभी भी कई कठिनाइयां यथावत थी। उत्तर-पूर्व में कृषि प्रधान भूभाग पर जाटों का तो अन्यत्र कई छोटे-बड़े भूभाग राजपूत व मुसलमानों के आधीन थे और आये दिन मुसीबतें खड़ी कर रहे थे। इन्हें अपने अधिकार में करना आवश्यक हो गया था।

 
बीका ने सर्वप्रथम जाटों से निपटने की सोची। यह जाट बाहुल्य क्षेत्र कुल छ: जातियों के प्रभाव में था। इनमें प्राय: खींचतान चलती रहती थी और परस्पर लड़ते रहते थे। बीका के भाग्य से एक ऐसी ही घटना घटित हो गई और उन्हें जाटों के बीच हस्तक्षेप करने का मौका मिल गया। हुआ यह कि गोदारों का प्रमुख पांडू सारन जाट जाति के मुखिया पलू (पूला) की स्त्री को ले भागा। इस पर सिवाना के निकटस्थ नरसिंह जाटू की मदद से पांडू पर चढ़ आया। यह देखकर घबराया हुआ पांडू बीकाजी की शरण में आया और निवेदन किया कि यदि आप मुझे इस  आपत्ति से उबार लें तो मैं निज बंधुबांधव व मित्रों सहित आपकी प्रजा बन जाऊँगा। बीकाजी को और क्या चाहिए था। बीकाजी ने अपने काका कांधल को सेना के साथ पांडू के संग कर दिया और तुरत-फुरत में रात्रि को ही नरसिंह जाटू को जा मारा। नरसिंह के अंत के साथ ही समस्त जाटों पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि वे सब के सब एक-एक करके बीकाजी की शरण में आ गये और राजसी नजरें देकर राठौड़ वंश की प्रजा बन गये।

 
जाटों को अपने अधीन कर लेने से बीकाजी जांगलू प्रदेश की एक प्रभावी शक्ति बन गये लेकिन अभी भी कुछ भाग ऐसा था जिस पर राजपूतों और मुसलमानों का अधिकार था और आये दिन उनकी प्रभुसत्ता को चुनौती देते रहते थे। जाटों की शक्ति के जुड़ जाने के बाद बीकाजी ने इन्हें अपने अधीन करने का मानस बनाया। सर्वप्रथम सीहाणे पर आक्रमण किया जहाँ का स्वामी (जोहिया राजपूत) उनके पैरों में आ पड़ा और इसके बाद देवल खीची के 140 गाँवों को अपने राज्य में मिला लिया। एक के बाद एक सारा जांगलू प्रदेश अब बीकाजी के कब्जे में था। ऐसे ही हिसार के पठानों से भी कई गाँव मुक्त करवाये और अपनी सीमा को पंजाब की सीमा तक पहुँचादी।

 
ज्ञातव्य है कि बीकाजी का विजयी-रथ निरन्तर जारी रहा, एक के बाद एक विजय प्राप्त करते रहे। जब वे उत्तर में कांधलजी के सहयोग से हिसार की सीमा तक पहुँचे तो वहाँ उनका सूबेदार सारंगखां से मुकाबला होना ही था। इस समय मोहिल सरदारों का सहयोग भी उसे था। उधर दिल्ली से बादशाह दौलतखां लोदी को भी बीकाजी के बढ़ते कदमों को रोकने के लिए तैयार कर लिया था लेकिन कुशल रणनीति के कारण बीकाजी व कांधलजी के आगे टिक नहीं सके। मोहिलों के नेता नरबद व बरसल युद्ध में मारे गये और सूबेदार सारंगखां को युद्ध भूमि से भागना पड़ा।

 
युद्ध के पश्चात् बीकाजी तो द्रोणपुर में ठहर गये किंतु कांधलजी ने अपना विजयी अभियान जारी रखा। एक दिन जब वे मोजा साहेब के तालाब पर डेरा डाले हुए थे, एक दिन सूबेदार की मुसलमान सेना ने अचानक उन पर धावा बोल दिया। दोनों और से संघर्ष हुआ किंतु इस लड़ाई में कांधलजी की मृत्यु हो गई और उनकी सेना को मैदान छोड़ना पड़ा। जब कांधलजी की मृत्यु का समाचार बीकाजी को मिला तो वे अपने काका के बलिदान को सहन नहीं कर सके और उन्होंने प्रतिज्ञा की कि-'जब तक सारंगखां को न मार लूगा तब तक अन्न ग्रहण नहीं करूंगा।'

 
कांधलजी के बलिदान ने जोधपुर शासक जोधाजी सहित सभी राठौड़ों में एकता का नया संचार कर दिया। जोधपुर की बड़ी सेना बीकाजी से आ मिली और तेजी से सारंगखां की ओर कूच कर दिया। मोजा कानासर के मैदान में दोनों के बीच सामना हुआ। सारंगखा पहली ही मुठभेड़ में मारा गया और बीकाजी ने विजय पताका फहरादी।

 
युद्ध के उपरांत राव जोधाजी द्रोणपुर में रुके और बीकाजी को अपने पास बुलाकर उनके बाहुबल और राजनीति की प्रशंसा करते हुए कहा कि तुमने मेरे नाम को खूब उज्वल किया, मैं तुम्हारें कर्तव्य से परम संतुष्ट हूँ। अब मैं दो बाते तुमसे कहता हूँ, उन्हें मेरी आज्ञा मानकर शिरोधार्य करो। एक तो यह कि लाडनू परगना मुझे दो और दूसरी बात यह कि तुम कभी अपने भाई के राज्य पर आक्रमण करने की चेष्टा मत करना। राव बीकाजी ने पिता के दोनों वचन सादर अंगीकृत कर लिए, किंतु उन्होंने कहा कि यदि आप मुझसे संतुष्ट हैं तो एक वर मैं भी चाहता हूँ, वह यह कि राठौड़ वंश के वंश परम्परा के पैतृक राजचिह्न मुझे प्रदान किये जायें, क्योंकि न्याय पूर्वक मैं ही उनके संरक्षण का अधिकारी हूँ। जोधाजी ने बीकाजी की इस बात को प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार करली।

 
किंतु राव जोधा की मृत्यु के पश्चात् जोधपुर सिंहासन पर बैठे सूजाजी ने जब राजचिह्न देने से मना कर दिया तो संघर्ष हुआ। सूजाजी बीकाजी के आगे नहीं ठहर सके और स्वयं सूजाजी की माता ने राजचिह्न बीकाजी को देकर संघर्ष को रोका। माताश्री ने दोनों भाइयों में पुन: स्नेह-धारा के प्रवाह को तेज किया जिसके परिणाम स्वरूप जोधपुर-बीकानेर दोनों राज्यों में राठौड़ों की पताका अनवरत लहराती रही।

 
अंततः बीकाजी संवत 1561 (1504 ई.) आसोज सुदी 3 के दिन राजस्थान को एक नया राज्य 'बीकानेर उपहार में प्रदान कर इस संसार से पदार्पण कर गये। आज उनके अनवरत संघर्ष करते रहने की प्रेरणा देते हुए महान् व्यक्तित्व की स्मृति शेष है।

 (लेखक – तेजसिंह तरुण “राजस्थान के सूरमा” )
 

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1 टिप्पणी:

  1. बीकानेर और बीका जी की रोचक गौरवपूर्ण गाथा ... अच्छी जानकारी ...

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