शुक्रवार, फ़रवरी 03, 2017

महाराणा प्रताप

वीर प्रसविनी जौहर भूमि मेवाड़ ने ऐसे कई वीर-वीरागंनाओं को जन्म दिया है, जिनके साहस, शौर्य, त्याग और बलिदान की वीर गाथाओं से प्रत्येक भारतीय अपने को गौरवान्वित मानता है और ये वीर गाथाएं आज भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ है।
 
मेवाड़ की इस वीर वसुधरा ने ही 9 मई. 1540 के दिन राणा प्रताप को जन्म दिया जिसके कारण स्वयं वह धन्य हो गई। प्रताप ने जिन विपरीत परिस्थितियों में अपने देश की स्वतन्त्रता के लिये संघर्ष किया, वह अपने में अनुपम एवं अनुकरणीय है। यही कारण है कि प्रताप अपने पूर्ववर्ती शासकों की तुलना में अधिक प्रसिद्ध हुए और प्रात: स्मरणीय हो गये। निसन्देह प्रताप की कुछ ऐसी उपलब्धियां थी जो इतिहास में अन्यत्र देखने को नहीं मिलती है। हम यहां प्रताप की उन उपलब्धियों और चारित्रिक विशेषताओं का अध्ययन करना चाहेगें जिनके कारण प्रताप भारतीय इतिहास में एक देदीप्यमान नक्षत्र के रूप में प्रेरणा के प्रकाश स्तम्भ बन गये।
 
विषम परिस्थितियों के पथिक-प्रताप से पूर्व मेवाड़ अकबर के हाथों 1568 के चित्तौड़ युद्ध में भारी पराजय के कारण टूट चुका था और उसकी सारी शक्ति बिखर चुकी थी। यहां तक कि राजधानी चित्तौड़ भी राणा उदयसिंह के हाथों से निकल गई थी। उदयसिंह अपनी इस पराजय के सदमे को सहन नहीं कर सके और 1572 ई. मे मृत्यु को प्राप्त हो गये। पिता ही थी कि प्रताप एक शासक होते हुए भी न उनके पास पास राजधानी थी, न सेना थी और न राज प्रासाद ही था। और तो और इस विपरीत समय में उनके अनुज शक्ति सिंह, जगमाल और सगर तक अकबर के दरबार की शोभा बन गये थे, किन्तु प्रताप ने अपना धैर्य नहीं खोया। एक कुशल संगठक के रूप में प्रताप अटूट विश्वास के साथ राजगद्दी की गरिमा को बढ़ाने की दिशा में जन-शक्ति को एक सूत्र में बांधने का प्रयास करते रहे। सर्दी-गर्मी और वर्षा की चिंता किये बिना तपस्वी के रूप में उन्होंने मेवाड़ का कौना-कौना घूमा। स्वातन्त्र्य भावना को जनजन में जाग्रत कर समय को करवट दी। बहुत शीघ्र ही प्रताप राजा के रूप में नहीं बल्कि एक जन-नेता के रूप में प्रतिष्ठित हो गये। एक नये उत्साह का संचार हुआ और शीघ्र ही प्रताप 1576 ई. में अकबर को इतिहास प्रसिद्ध हल्दीघाटी की रणभूमि में सशक्त चुनौती देने के निमित प्रस्तुत हुए। इस चुनौती से पूर्व प्रताप मेवाड़ को एक राज्य का स्वरूप प्रदान कर चुके थे। भामाशाह आदि कुशल प्रशासकों के सहयोग से प्रताप ने बिखरे हुए मेवाड़ को एक सशक्त राज्य बना दिया था। जो कि उस समय की परिस्थितियों में बहुत कठिन कार्य था।
 
स्वतन्त्रता एवं साहस के प्रतीक-अकबर अपने समय में विश्व का सर्व शक्तिमान सम्राट था। मेवाड़ उसके विशाल साम्राज्य की तुलना में कुछ भी नहीं था, किन्तु प्रताप स्वतन्त्रता प्रिय थे। उन्हें अधीनता स्वीकार नहीं की। प्रताप ने अपने वीरोचित स्वभाव के अनुकूल अकबर को चुनौती देकर सचमुच में सबको आश्चर्य चकित कर दिया था। जयपुर, जोधपुर, गुजरात और मालवा की कई बड़ी शक्तियां अकबर के आगे घुटने टेक चुकी थी। अकबर प्रताप के इस साहस । पर स्वयं अचम्भित था। जब प्रताप झुकने को तैयार नहीं हुए तो उसने अपने कुशल सेनापति मानसिंह को प्रताप की शक्ति को समूल रूप से नष्ट करने के लिए भेजा। किन्तु क्या हुआ ? युद्ध भूमि पर उपस्थित स्वयं अकबर के दरबारी लेखक बदायूंनी ने भी अपनी नैतिक पराजय को स्वीकार किया है। अन्य प्रमुख मुस्लिम लेखक अबुल फज़ल ने प्रत्यक्ष में तो पराजय नहीं स्वीकारी किन्तु युद्ध के बाद मानसिंह को अकबर द्वारा दी की गई प्रताड़ना का उल्लेख कर पराजय का संकेत दिया है। राजपूत स्रोत तो प्रताप की जीत का स्पष्ट उल्लेख करते ही हैं जिनमें जगदीश के मन्दिर की प्रशस्ति में तो प्रताप की विजय का स्पष्ट वर्णन है।
 
इस प्रकार असम्भव सम्भव हो गया। प्रताप ने हल्दीघाटी को अमर कर दिया और हल्दीघाटी की युद्ध भूमि ने प्रताप को भारतीय इतिहास में स्वातन्त्र्य  भावना का प्रेरणा स्तम्भ बना दिया। सचमुच में हल्दीघाटी के युद्ध की ख्याति का मूल कारण प्रताप द्वारा स्वतन्त्रता के लिए लड़ना था। ये तो प्रताप ही थे जो संघर्ष कर गये, अन्यथा अकबर से मेवाड़ जैसे छोटे राज्य द्वारा लोहा लेना उस समय कल्पना से बाहर की बात थी। इसी साहस के कारण प्रताप आज हम सबके लिए प्रात: स्मरणीय है।
 
रण-कौशल में नये मूल्यों के प्रणेता-प्रताप जहां एक कुशल संगठक और स्वातन्त्र्य भावना के अमर साधक के रूप में विख्यात हुए वहाँ रण-कौशल में भी उन्होंने कुछ नये मूल्यों की स्थापना की। प्रताप से पूर्व के राजपूती शासक मैदानी युद्ध की ही परम्परा का अनुसरण करते रहे थे, किन्तु प्रताप प्रथम शासक थे जिन्होंने गुरिल्ला युद्ध पद्धति का प्रयोग कर अकबर को लोहे के चने चबाने को मजबूर कर दिया। अकबर जैसे शक्ति शाली सम्राट का सफल न होने का मुख्य कारण प्रताप की गुरिल्ला युद्ध-पद्धति ही थी। इसी प्रकार प्रताप से पूर्व राजपूत शासक दुश्मन से घिर जाने पर युद्ध भूमि नहीं छोड़ते थे, किन्तु प्रताप ने इस लीक से हटकर एक नई दिशा दी और संघर्ष को अनवरत रखने के लिए दुश्मन की सेना द्वारा घेरे जाने पर उन्होंने हल्दीघाटी का मैदान छोड़ दिया था।
 
यही नहीं, प्रताप से पूर्व युद्ध करने का मुख्य दायित्व राजपूत सरदारों पर होता था। प्रताप ने यहा भी एक क्रान्तिकारी कदम उठाया और प्रथम बार अपने राज्य की सभी जातियों को सेना में स्थान दिया। विशेषकर उन्होंने मेवाड़ के बहुसंख्यक आदिवासियों का जिस तरह सहयोग लिया, निसन्देह उनकी पैनी दृष्टि का परिणाम ही कहा जायेगा। आदिवासी पहाड़ी जाति होने के कारण मेवाड़ की पहाड़ियों में युद्ध के लिए ये लोग बहुत ही सक्षम आदिवासी। अगर यह कहा जाए तो कोई गलत बात नहीं होगी कि प्रताप की सफलता का मुख्य राज ये आदिवासी ही थे। प्रताप ने भी इस बहादुर जाति के प्रति पूरा सम्मान दर्शाया और इस जाति के मुखिया को अपने समकक्ष 'भीलू राणा' के खिताब से विभूषित कर दरबार में बराबर का स्थान दिया, जिसकी कल्पना भी राजतन्त्र में नहीं की जा सकती थी। प्रताप ने ऐसा कर निसन्देह उस समय के राजतन्त्र को एक नई दिशा दी। प्रताप के बाद आज तक उनके वंशज इनके के प्रति प्रताप के ही समान पूर्ण सम्मान दर्शाते रहे हैं।
 
इस प्रकार प्रताप मेवाड़ राज्य पर ही नहीं अपितु सम्पूर्ण देश पर अपने अप्रतिम स्वतन्त्रता संघर्ष, असीम धैर्य, त्याग एवं बलिदान की एक चिर-स्मरणीय छाप छोड़ गये हैं। उनके इन्हीं विशेष गुणों के कारण प्रताप स्वतन्त्रता प्रेमियों के लिए चिर-प्रेरणा स्रोत एवं जन-जन में वन्दनीय हैं तथा रहेंगे।
 
आवश्यकता हल्दी घाटी-युद्ध के पुनर्लेखन को-चार सौ वर्षों से अधिक बीत जाने पर भी अगर किसी देश का इतिहास-दोष यथावत रहता है तो निसन्देह वह उस देश का दुर्भाग्य ही कहलाता है। हमारे देश में यह विडम्बना ही रही है कि यहां का इतिहास बहुत तोड़-मोड़ कर लिखा गया है। लगभग सभी इतिहासकार इस तथ्य पर एक मत है कि भारतीय इतिहास का पुनर्लेखन आज की एक बड़ी आवश्यकता है।
 
राजतन्त्र में शासकों की उदासीनता और बाद में अंग्रेजों ने योजनाबद्ध भारतीय इतिहास को तोड़ा-मोड़ा और कई वास्तविक तथ्यों को ओझल कर दिया। यही प्रहार प्रताप और उनके इतिहास प्रसिद्ध हल्दी घाटी युद्ध के साथ भी हुआ। आज हमारे विद्यार्थी हल्दी घाटी युद्ध के परिणाम के बारे में जो कुछ पढ़ रहे है। वह नितान्त गलत है। जबकि स्वयं तत्कालीन मुस्लिम लेखक अबुल फज़ल और बदायूंनी जो युद्ध के मैदान में और मेवाड़ से आगरे तक की वापसी का एक प्रत्यक्षदर्शी लेखक है, अपने ग्रंथ मुंतखुबउतवारिख (जि. 2, पृष्ठ 238) पर लिखता है कि हमारी जो फौज पहले हमले में ही भाग निकली थी, नदी (बनास) को पार कर 5-6 कोस तक भागती ही रही.मानसिंह के वे राजपूत, जो हरावल में थे भागे, जिससे आसफ खां (दूसरा प्रमुख सेनापति) को भी भागना पड़ा और उन्होंने दाहिने पाश्र्व के सैय्यदों की शरण ली। यदि इस अवसर पर सैय्यद लोग टिके न रहते तो हरावल के भगे हुए सैन्य ने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी थी कि बदनामी के साथ हमारी हार होती।'
 
अलबदायूंनी के उपर्युक्त कथन में स्पष्ट संकेत मिलता है कि शाही सेना की पराजय हुई, केवल बदनामी से बचने की बात कहता है। एक दरबारी लेखक होने के कारण उसका ऐसा कथन स्वाभाविक है। ऐसा ही एक कथन स्वयं अबुल फज़ल का है जो न केवल व दरबारी लेखक ही था बल्कि अकबर के नौ रत्नों में भी था। वह लिखता (अकबर नामा, अंग्रेजी अनुवाद, जिल्द 3, पृष्ठ 246) है कि-'सरसरी तौर से देखने वालों को तो राणा की जीत नजर आती थी, इतने में ही एकाक शाही फौज की जीत होने लगी, जिसका कारण यह हुआ कि सेना में यह अफवाह फैल गई कि बादशाह स्वयं आ पहुंचा है। इससे बादशाही सेना में हिम्मत आ गई...।"
अबुल फज़ल के इस कथन में भी स्पष्ट है कि शाही सेना की हिम्मत टूट चुकी थी। आगे जो कुछ वह लिखता है मात्र अपने संरक्षक के प्रति सम्मान दर्शाना था। चूंकि बदायूंनी युद्ध के उपरांत वापसी के समय का वर्णन करते हुए जो लिखता है उससे स्पष्ट है कि उस समय के जनसामान्य में भी प्रताप की जीत का ही समाचार फैला हुआ था। वह लिखता है कि-'मैं बाकोर (बागौर) और मांडलगढ़ होता हुआ आम्बेर पहुंचा। लड़ाई की खबर सर्वत्र फैल गई थी, लेकिन मार्ग में उसके सम्बन्ध में मैं जो कुछ कहता, उस पर लोग विश्वास नहीं करते हैं। 
 
अत: दोनों मुस्लिम लेखक जिन्होंने अप्रत्यक्ष में लेखकीय धर्म का निर्वाह करते हुए युद्ध में प्रताप के पक्ष को प्रबल माना और अपने कथनों में वास्तविकता को समझाने के लिए बहुत कुछ स्पष्ट संकेत दिये हैं। जो अगर प्रताप का पक्ष कमजोर होता तो ये बढ़ा-चढ़ा कर उल्लेख करते जो उस समय के दरबारी लेखकों से अपेक्षित था, किन्तु ऐसा कहीं भी देखने को नहीं मिलता है। बल्कि कुछ और भी ऐसे तथ्य दोनों लेखकों ने दिये हैं जिनसे भी स्पष्ट होता है कि हल्दी घाटीयुद्ध में अकबर सफल नहीं हो सका। चूंकि दोनों ही लेखकों ने इस युद्ध के बाद मानसिंह की ड्योढी बन्द करने व उसे भरे दरबार में फटकारने का भी उल्लेख करते हैं। स्मरण रहे कि मानसिंह उस समय के दरबारियों में सबसे बड़ा मनसबदार था। उपर्युक्त तथ्यों के अतिरिक्त उदयपुर नगर में स्थित जगदीश के मन्दिर की प्रशस्ति और 'राणा रासो' में हल्दी घाटी युद्ध में प्रताप की विजय का स्पष्ट उल्लेख है।
 
इतना सब कुछ स्पष्ट होने पर भी अभी तक देश की पाठ्य पुस्तकों में हल्दीघाटी के युद्ध के बारे में गलत-सलत क्यों पढ़ाया जा रहा है? यही एक ऐसा प्रश्न है जो आज विचारणीय है। इतिहास तो सत्य तथ्यों की खोज का ही दूसरा नाम है। जाति धर्म और देश इसमें बाधक नहीं बनने चाहिए।
 
पराक्रम एवं शौर्य का प्रतीक दिवेर का युद्ध-अकबर ने सोचा भी न था कि हल्दी घाटी के युद्ध का यह परिणाम होगा। पराजय उस समय अकबर को असहनीय थी लेकिन इस युद्ध के बाद उसे यह स्वीकार करना पड़ा कि प्रताप को अधीन करना बहुत कठिन है। यही कारण है कि 1580 ई. के मध्य शाहबाज खां को मेवाड़ से बुला लेने के बाद मेवाड़-विरोधी मुगल सैनिक कार्यवाहियों में शिथिलता आ गई। बस, जगह-जगह मुगल थाने बिठा दिये और इन पर बैठे सैनिकों को राणा का पीछा करते रहने के निर्देश थे। महाराणा प्रताप ने इस मुगलिया उदासीनता का लाभ लिया और गोगुंदा, कुंभलगढ़, उदयपुर सहित कई थानों पर अधिकार कर लिया वे शीघ्र ही दिवेर के थाने पर अधिकार करने के उद्देश्य से आगे बढ़े। सामरिक दृष्टि से इस थाने का बहुत महत्व था। डॉ. देवीलाल पालीवाल के शब्दों में यह मेवाड़ में प्रवेश करने वाली मुगल सेना का पहाड़ी प्रवेश-द्वार था। यही कारण है कि अन्य थानों के मुकाबले यहाँ मुगल सेना भी अधिक थी और अकबर इसकी सुरक्षा का दायित्व भी अपने विश्वस्त व्यक्तियों के कंधों पर था।
 
महाराणा प्रताप को भी इसका पता था कि दिवेर पर विजय प्राप्त करना कोई सरल कार्य नहीं है, इसलिए उन्होंने भी अपने पुत्र अमरसिंह, भामाशाह जैसे विश्वस्त वीरों के साथ वनवासी लड़ाकों के साथ दिवेर पर धावा बोला। अब तक प्रताप की युद्ध नीति में परिवर्तन आ चुका था। उन्होंने आमने-सामने और घोषित युद्ध करने की जगह जहाँ जब अवसर देखा वहीं आक्रमण करने की नीति अपनाली थी। दिवेर का यह युद्ध भी इसी नीति का हिस्सा था। सही भी था उनका ऐसा करना। दिवेर पर अचानक आक्रमण का परिणाम था कि बड़ी संख्या में मुगल सैनिकों के होते हुए भी वे सम्भल नहीं पाये और भाग खड़े होने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था। सामने आया वह गाजर-मूली की तरह कट मरा। स्वयं प्रताप के सामने मुगलियां प्रमुख बहलोल खां आया तो वो एक ही बार में घोड़े सहित मारा गया। ऐसे ही दिवेर का थाना प्रमुख एवं अकबर का चाचा सुल्तान खां कुंवर अमरसिंह के बछे के जोरदार वार का शिकार हो गया। इस युद्ध में भामाशाह एवं उसके भाई ताराचंद ने भी अपने अद्वितीय वीरता का परिचय दिया। अन्य राजपूत एवं वनवासी वीरों ने इस युद्ध में भी जिस बहादुरी का परिचय दिया वह उल्लेखनीय है।
 
वर्तमान में भीम और अजमेर के मध्य स्थित दिवेर ग्राम से दो-तीन किलोमीटर दूर स्थित तत्कालीन दिवेर थाने के अवशेष आज भी विद्यमान है और प्रताप के अदम्य साहस की कहानी कहते खड़े हैं। यही वह युद्ध था जिसके बाद से अकबर मेवाड़ को अधीन करने की बात भूल सा गया और प्रताप ने पुन: मेवाड़ पर अधिकार करने का लक्ष्य बनाया जो 1597 ई. में अर्थात् अपनी मृत्यु से पूर्व तक बहुत कुछ प्राप्त करने में सफल रहे। सच तो यह है कि इस युद्ध की सफलता ने मेवाड़ के शौर्य, पराक्रम और साहस की। थाती में चार चांद लगा दिये थे।
 
 
(लेखक तेजसिंह तरुण राजस्थान के सूरमा” )

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