रविवार, फ़रवरी 19, 2017

आखिरी पड़ाव

रेलवे के वेटिंग हॉल मे एक शख्स गाड़ी के इंतजार मे अखबार के पन्ने पलट रहा था । चेहरे पर कुछेक झुर्रियां उसके वृद्ध होने की गवाही दे रही थी। उसके कान ट्रेन  के आने की आवाज पर टिके थे । करीब चार दशक के बाद आज फिर से उसके कदम उस शहर की तरफ चल पड़े ।

अंकल ये सीट खाली है ?

विश्वनाथ ने अखबार से नजरे हटाकर ,चश्मा दुरुस्त करते हुये ऊपर देखा तो सामने एक युवती दो बैग थामे खड़ी थी ।
“.....”
अंकल...”
“हाँ...हाँ बेटे  खा...खाली है...”, बैठो ।
विश्वनाथ युवती को देखकर एक पल को चौंक गये ।
“थैंक यू अंकल “, कहते हुये युवती ने दोनों बैग सीट के पास रखे और बैठ गई।
आप कहाँ जाओगी बेटे ?” , विश्वनाथ ने कुछ समय बाद पूछा।

“लुधियाना, और आप अंकल  , लड़की ने पानी की बोतल का ढक्कन खोलते हुये पूछा ।
“मैं ...मैं भी.... “ 
“आप वहीं रहते हैं अंकल ?”
“हाँ...नहीं... मेरा एक पुराना दोस्त है वहाँ , काफी अरसा हो गया , उसी से मिलने जा रहा हूँ” , विश्वनाथ ने कहा।

“और बेटा आप....?”
“अंकल मैं वहीं रहती हूँ , हमारा घर है वहाँ। अभी कुछ दिन कॉलेज की छुट्टियाँ थी तो घर जा रही हूँ। “, युवती ने जवाब दिया।

“किस एरिया मे रहते हैं आपके दोस्त अंकल ?”, युवती ने पूछा।
“वो ...वो एरिया तो मुझे याद नहीं , लेकिन हाँ उसका फोन नंबर है मेरा पास , मैं उसको स्टेशन पहुँचकर फोन करूंगा। “

“जी अंकल” , युवती ने पानी की बोतल का ढक्कन बंद करते हुये कहा ।
तभी स्पीकर पर  ट्रेन के आने की घोषणा हुई और विश्वनाथ की बात उसमे दबकर रह गई, युवती तुरंत उठ खड़ी हुई और अपने दोनों बैग लेकर प्लेटफॉर्म पर आ गई।

विश्वनाथ ने भी अपनी छड़ी और बैग उठाया और वो भी प्लेटफॉर्म पर ट्रेन के आने का इंतजार करने लगे , साथ ही वो उस युवती को भी देखे जा रहे थे जो थोड़ी दूरी पर ट्रेन के इंतजार मे खड़ी थी । गुजरा हुआ वक़्त उनके जहन मे रह रहकर सरगोशी कर रहा था।

कुछ अंतराल पर ट्रेन के आते ही भगदड़ शुरू हो गई , सभी पैसेंजर अपनी अपनी बोगी और सीट खोजने मे लग गए। विश्वनाथ के कदम अपनी बोगी की तरह बढ़ गए , उन्होने पीछे मुड़कर देखा तो  युवती दूसरी बोगी मे चढ़ चुकी थी।

रात का एक बज चुका था , पूरी बोगी मे यात्रियों के खर्राटे गूंज रहे थे। दूसरी तरफ विश्वनाथ की आँखों मे नींद का नामोनिशान नहीं था और वो अपनी सीट पर करवटें बदल रहे थे।  अतीत से उनका द्वंद चल रहा था ।

उन दिनों विश्वनाथ की पहली पोस्टिंग लुधियाना हुई थी । ऑफिस के पास ही उन्हे एक फ्लैट किराए पर मिल गया था । उसी प्रवास के दौरान सामने के मकान मे रहने वाली रंजना नाम की युवती से नजरें मिली तो सिलसिले चल निकले। महीनों तक एक दूसरे को देखते और आगे बढ़ जाते। फिर धीरे धीरे बातों और मुलाकातों का दौर भी चल पड़ा । सालभर तक दोनों  छुपछुप कर मिलते रहे , कभी सीढ़ियों मे , कभी छत तो कभी पार्क मे।

यूँ ही एक साल गुजर गया । एक दिन दोपहर बाद अचानक विश्वनाथ के ट्रान्सफर ऑर्डर आ गए और उन्हे तुरंत कोचीन ऑफिस मे रिपोर्ट करने को कहा गया। अचानक हुये इस ट्रान्सफर से विश्वनाथ काफी विचलित हो गए मगर सरकारी नौकरी के चलते उन्हे उसी रात कोचीन के लिए निकलना पड़ा। इस दौरान वह रंजना से भी नहीं मिल पाया और भारी कदमों से अपना समान लेकर स्टेशन की तरफ बढ़ गया।

वक़्त गुजरता गया ।

इस दरमियाँ उसने बहुत बार लुधियाना जाने की सोची मगर नौकरी के कामों मे  इतना उलझकर रह गया की  पाँच साल गुजर गए। इसी दौरान परिवार वालों ने दवाब बनाकर विश्वनाथ की शादी कर दी और फिर गृहस्थी और नौकरी  ने देखते देखते ही उसके जीवन के चार दशक छीन लिए।

आज नौकरी और गृहस्थी से सम्पूर्ण फुर्सत मिली तो जिंदगी के उस हिस्से को अपने से जोड़ने निकल पड़ा।
ट्रेन लुधियाना पहुँच चुकी थी। एक एक करके सभी यात्री उतर चुके थे ।   

विश्वनाथ स्टेशन के पास बने एक होटल की तरह चल पड़े। होटल से जल्दी फ्रेश होकर वो बाहर आ गए और फिर उनके कदम उस तरफ बढ़ गए जहां वो किसी को इंतजार मे छोड़ आए थे।

बहुत कुछ बदल चुका था । काफी जद्दोजहद के बाद उन्हे वो फ्लैट नज़र आया जहां वो उन दिनों ठहरे  थे। बाहर से मकान काफी जीर्ण हालत मे था। मकान के अंदर जाने का कोई कारण नहीं था इसलिए वो सामने के पार्क मे जा बैठे। घंटों उस पार्क मे गुजारने के बाद वो अपने दिल को नहीं रोक पाये और  आखिर उनके कदम उस मकान की तरफ बढ़ गए।

“अरे अंकल आप ?”

सामने उस लड़की को देखकर  विश्वनाथ चौंक गए।    

“त...तुम यहीं रहती हो”
“हाँ”
“वो... ट्रेन मे मेरा मोबाइल कहीं गिर गया , इसलिए दोस्त को ढूँढता हुआ इधर आया था , लेकिन लगता है वो अब यहाँ नहीं रहता।“

“चलिये फिर आप हमारे घर चलिये अंकल”
युवती विश्वनाथ को अपने घर के अंदर ले गई।
“क्या लेंगे अंकल ? चाय या कॉफी ?”
“क...कुछ भी..... तुम्हारे मम्मी-पापा ?  ,विश्वनाथ ने कुछ देर रुककर पूछा।

“मैं नानी के साथ रहती हूँ अंकल ,मैं चाय लाती हूँ फिर बैठकर बात करते हैं ।“, कहकर युवती अंदर चली गई।

विश्वनाथ हॉल मे बैठे इंतजार करने लगे । उनकी नजरे किसी को  ढूंढ रही थी । क्या इतने सालों बाद वो रंजना को पहचान लेगा ? वो खुद से ही सवाल कर रहे थे। ये लड़की कौन है ? इसकी शक्ल रंजना से काफी मिलती है । क्या ये .....।
“लीजिये अंकल , आपकी चाय...  
विश्वनाथ ने काँपते हाथों से चाय का कप थामा।

“मैं तुम्हारा नाम पूछना तो भूल ही गया बेटी “,विश्वनाथ ने चाय की चुस्की लेते हुये पूछा।
“विशाखा, अंकल ” , लड़की ने कहा।
“बहुत प्यारा नाम है “

“माँ ने रखा था”, विशाखा ने मुस्कराते हुये कहा।
“तुम्हारी मम्मी नहीं दिखाई दे रही ....”
 “करीब दस साल मम्मी मुझे छोड़कर भगवान के पास चली गई अंकल ”
“का...क्या...क्या हुआ रंजना को .... म...मेरा मतलब आपकी मम्मी को “,विश्वनाथ बुरी तरह से सकपका गए , उनका पूरा वजूद काँप कर रहा गया।  

“विशाखा ने चौंक कर विश्वनाथ की तरफ देखा”
विश्वनाथ के हाथ काँप रहे थे । कप से चाय छलक रही थी ।
“अंकल आप ठीक तो है ना “, विशाखा ने उनके हाथ से कप लेते हुये कहा।  

“अं... हाँ मैं...मैं ठीक हूँ , मुझे अब चलना चाहिए”, विश्वनाथ ने आँखें पौंछते हुये कहा, और उठकर चलने लगे।

विशाखा उन्हे छोड़ने मुख्य द्वार तक आई।
“अंकल”
“हाँ ... बेटे “,विश्वनाथ ने भर्राई हुई आवाज मे पूछा।

“आप.....  विश्वनाथ अंकल हो ना ?”

“ हाँ...मगर  त...तुम्हें कैसे पता ?”, विश्वनाथ ने डगमगाते हुये पूछा।
“मम्मी ने एक बार बताया था”
“क...क्या”
“हाँ अंकल , आइये सामने पार्क मे बैठते हैं वही बैठकर बात करते हैं। विशाखा उनका हाथ पकड़कर पार्क की बेंच तक ले गई।  

आपके जाने के करीब पंद्रह सालों तक मम्मी  ने  आपका इंतजार किया , बाद मे परिवार वालों के दबाब के चलते उनकी शादी कर दी गई । शादी के तीन साल बाद मेरा जन्म हुआ और उसके अगले साल ही पापा ने मम्मी को तलाक दे दिया। मम्मी नानी के साथ रहने लगी। वो बहुत खामोश खामोश सी रहने लगी थी । वो अक्सर बीमार भी रहने लगी। एक बार उन्होने मुझे आपके बारे मे बताया था । बताते हुये उनकी आँखों से बार बार आँसू बह रहे थे। वो आपको मरते दम तक नहीं भूली थी । उन्होने मेरा नाम भी आपके नाम से मिलता जुलता रखा था ।

विशाखा की आँखें  नम हो चुकी थी । उसने अपने आँसू पौंछकर मुस्कराते हुये,  विश्वनाथ का  हाथ पकड़ते हुये कहा , “आप ने सच मे बहुत देर कर दी अंकल” , दूसरे ही पल विश्वनाथ का थका हुआ शरीर एक और लुढ़क गया। उसी दौरान उनकी जेब मे पड़े मोबाइल की घंटी बज उठी ।

“विक्रम”

 

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