बुधवार, फ़रवरी 08, 2017

राजा मानसिंह

21 दिसम्बर, 1550 को राजा भगवान दास की पटरानी भागवती की कूख से जन्मे मानसिंह राजस्थान के उन राजा-महाराजाओं में हैं जिन्होंने अपने समय में असीम ख्याति अर्जित की और इतिहास बनाया। यह विडम्बना ही है कि समय ने उन्हें नहीं समझा और जैसी प्रसिद्धि उन्हें मिलनी चाहिए थी वह उन्हें प्राप्त नहीं हो सकी। सम्भवत: इसका कारण था कि वे तत्कालीन मुगल सम्राट अकबर की सेवा में रहे और हल्दीघाटी जैसे स्वतंत्रता-संघर्ष में प्रताप के विरुद्ध लड़े। भारतीय जन-मानस में उनकी छवि बिगड़ने का एकमात्र कारण था। जबकि वे वीर साहसी और कुशल नीतिज्ञ थे। अपने जीवन में 77 युद्धों को अंजाम दिया और लगभग सभी में विजयी रहे। हल्दीघाटी युद्ध एक अपवाद कहा जा सकता है। यूं अब तक हल्दीघाटी में भी मानसिंह की विजय का उल्लेख होता आया है लेकिन अब जो तथ्य सामने आये हैं, इसे एक अनिर्णायक युद्ध ही माना जाने लगा है।
हल्दीघाटी युद्ध को यदि अपवाद मान लेते हैं तो यह कहना ही होगा कि राजा मानसिंह एक अपराजेय योद्धा थे। मानसिंह द्वारा लड़े युद्ध प्रचण्ड और विपरीत परिस्थितियों में लड़े गये थे। उनके इसी अपराजेय स्वरूप के कारण मुगल बादशाह अकबर के वे सबसे चहेते और खास बन गये थे। इसे यूं भी कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि वे उस समय मुगल साम्राज्य के प्रमुख स्तम्भ थे।
मानसिंह का बाल्यकाल आम्बेर से दूर मोजमाबाद में व्यतीत हुआ था। शस्त्र विद्या के साथ उन्हें हिन्दी, संस्कृत एवं फारसी भाषाओं में पारंगत किया
गया। बारह वर्षीय किशोर मानसिंह को आगरा में शाही सेवा में रखकर अकबर ने प्रशिक्षण की विशेष व्यवस्था की थी। इस दौरान मानसिंह को वह सब कुछ सिखाया एवं बताया गया जो एक क्षत्रिय राजकुमार को सीखना होता है।
कहा जाता है कि मानसिंह अपने बाल्यकाल में नित्यप्रति भागवत, गीता और रामायण का पाठ सुनते थे, इस निमित उनके निवास पर विशेष विद्वान पंडितों की व्यवस्था की गई। आखेट मानसिंह का विशेष शौक था, किशोरावस्था में उन्होंने अपने इस शौक को अम्बेर एवं आगरा में पूरा किया। जब आगरा में शाही प्रशिक्षण में थे तो मानसिंह ने युद्धकला में न केवल पारंगतता प्राप्त की बल्कि उन्होंने शीघ्र ही युद्ध में प्रत्यक्ष भाग लेने की इच्छा प्रकट की और उन्नीस वर्ष में ही रणथम्भौर-युद्ध में खुलकर भाग लिया।
 
रणथम्भोर मानसिंह का प्रथम युद्ध था जिसमें मानसिंह ने अपने युद्ध-कौशल का परिचय दिया। बस अब क्या था, अकबर ने इसके बाद मानसिंह को गुजरात अभियान में अपने साथ लिया। संयोग से इस अभियान में एक ऐसा क्षण आया जब अकबर के प्राण संकट में पड़ गये थे तब मानसिंह की चुस्ती-फुर्ती के कारण अकबर अपनी प्राण-रक्षा कर सका। उसके बाद मानसिंह के युद्ध-कौशल से ही यह अभियान सफल रहा और विजयश्री प्राप्त की। अकबर ने उसके शौर्य और कौशल का पुरस्कार भगवन्तदास और मानसिंह को 'नकारा-निशान' सम्मान के रूप में दिया।
ऐसा ही एक और अवसर मानसिंह को प्राप्त हुआ। एक बार जब सभी दरबारी बैठे थे और वीरता की बात चली तो नशे में धुत अकबर ने दीवार से तलवार लगाकर अपने सीने के द्वारा उसे मोड़ने का घातक प्रयास किया। इससे पहले कि तलवार अकबर का सीना चीर जाती, मानसिंह ने सम्राट के कोप की परवाह किये बगैर तलवार को झटक कर अकबर की प्राण-रक्षा की।
उत्त दोनों घटनाओं से एक बात स्पष्ट होती है कि मानसिंह बुद्धिमान एवं वीर प्रकृति का था। अन्यथा वह ऐसा नहीं करता। अकबर के मन में मानसिंह के प्रति एक विशेष अनुराग अथवा सम्मान घर कर गया और देखते ही देखते वह मुगल साम्राज्य का सम्माननीय व्यक्ति बन गया और अकबर के 'नव-रत्नों' में सम्मिलित हो गया।
रणथम्भोर गुजरात विजय के बाद मानसिंह ने एक के बाद एक देश के विभिन्न राज्यों में विद्रोहियों के दमन अथवा राज्य-विस्तार के अभियानों में मानसिंह ही मुख्य सेनानायक रहा। देश के बाहर काबुल आदि के आक्रमणों का नेतृत्व भी अकबर ने मानसिंह को ही सौंपा। उसने भी इस दूरस्थ क्षेत्र में मुगल झंडा लहराने में सफलता प्राप्त की और फिर अशान्त बिहार, उड़ीसा और बंगाल को विजयी कर मुगल साम्राज्य का विस्तार किया। अकबर ने बंगाल में एक सूबेदार के रूप में रहते हुए कई विद्रोहों को न केवल दबाया बल्कि उनसे इन क्षेत्रों से सदा-सदा के लिए मुक्ति भी दिलवादी। इससे उसका प्रभाव दिन दूना और रात चौगुना बढ़ता गया। अगर यह कहा जाए तो कुछ भी गलत नहीं होगा कि अकबर के समय उसके अतिरिक्त यदि अन्य कोई प्रभावशाली व्यक्ति था तो वह मानसिंह था। स्वतंत्रता प्रिय एवं पूर्णं हिन्दू-संस्कारी व्यक्तित्व
बादशाह की निष्ठापूर्वक सेवा करने के बावजूद वे मन से पूर्ण-रुपेण हिन्दू थे। इसका परिचय उन्होंने अनेक बार दिया। अकबर द्वारा स्थापित दीन-ए-इलाही धर्म स्वीकार करने से स्पष्ट मना करते हुए कहा था कि मुझे अपने हिन्दू धर्म में कोई कमी दिखाई नहीं देती है, मैं आपके लिए प्राण दे सकता हूँ किंतु धर्म नहीं दूंगा। यह कोई कम बात नहीं थी कि उस समय विश्व के सर्व शक्तिमान शासक को उसका एक मातहत दरबारी इस तरह स्पष्ट मना कर दे।
उत्त बात तो वह बात थी जिससे उनके निभींक व धर्मपरायण व्यक्तित्व होने का स्पष्ट प्रमाण मिलता है लेकिन उनके धार्मिक अनुराग की और भी कई झलकियां इतिहास के पन्नों पर दृश्यवान है जिनसे जन सामान्य अब तक अनावगत है। उदाहरणार्थ चित्तौड़ विजय के समय उन्होंने मीरांबाई के उपास्य देव भगवान कृष्ण की प्रतिमा आम्बेर लाकर भव्य जगत शिरोमणि मन्दिर में प्रतिष्ठापित की थी। आम्बेर में शिलादेवी की धूमधाम से प्रतिष्ठा के अतिरिक्त वृंदावन में अपार धन व्यय करके गोविन्ददेवजी के भव्य मंदिर का निर्माण करवाया जो आज भी वृंदावन का एक आकर्षण है। श्री आनन्द शर्मा ने अपने लेख 'अपराजेय योद्धा राजा मानसिंह' में ग्राउस के माध्यम से इसे उत्तर भरत का भव्यतम भवन माना है। बिहार व बंगाल में जब मानसिंह सूबेदार थे, कई ऐसे ही निर्माण करवाये अथवा कई जर्जर होते धार्मिक स्थलों का जीणोंद्वार करवाया, यथा-बैद्यनाथ धाम में 'मानसरोवर, बिहार के मानसून परगने के पारा ग्राम में दो मन्दिरों व तेलकूपी ग्राम के अनेक मन्दिरों को नया स्वरूप प्रदान किया। 'घाड़ की गैर' ग्राम में एक विशाल देवालय व सात छोटे मंदिरों और पटना में पड़े देवियों के मंदिर मानसिंह की धार्मिक निष्ठा को व्यक्त करते हैं। यहीं गंगा के तटपर अपनी माता भागवंती देवी के दाहस्थल पर खड़ा भव्य गौरी-शंकर मंदिर और काशी का मान मंदिर (इसका उल्लेख जहांगीर ने अपनी आत्मकथा में भी किया है) तथा बरसाना के पहाड़ पर बनवाया। विशाल एवं कलात्मक 'राधा मंदिर' आज भी इस यशस्वी नरेश के धर्मपरायण होने के जीवन्त प्रमाण है। ऐसे ही स्मारक, 'नीलकंठ महादेव' का मंदिर और साथ में सात कुएं ओर सरोवर का निर्माण उनके मन की धार्मिकता के साथ जनहितार्थ चिंतन को भी दर्शाता है, चूंकि कुएं व सरोवर जन-हितार्थ ही होते हैं। यही नहीं, प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ पुरी के विख्यात जगन्नाथ मंदिर का जीणोद्धार भी इस महापुरुष के हाथों हुआ और यहीं बना 'मुक्ति मंडप' आज भी उनके धार्मिक एवं स्थापत्यप्रेम की कहानी कहता हमारे सम्मुख उपलब्ध है।
ऊपर दर्शाये स्थलों के पीछे हमारा यहाँ यह जतलाना है कि मानसिंह वैसा नहीं था जैसा आज जन सामान्य में प्रचलित है। यह तो उस समय की राजनीतिक मजबूरी थी जो उसे मुगल साम्राज्य की सेवा में रहना पड़ा था। अन्यथा मानसिंह स्वयं स्वतंत्रता प्रिय व धर्मवान शासक था। मैं यहाँ पुन: हल्दी घाटी के युद्ध की बात कर रहा हूँ जिसमें कहने को मानसिंह और महाराणा प्रताप के बीच संघर्ष हुआ था लेकिन पाश्र्व में ऐसे कई प्रसंग है जिनकी गहराई में यदि जाएं तो स्पष्ट हो जाता है कि मानसिंह ने प्रताप को हर तरह से मदद की थी, चूंकि वह चाहता था कि कम से कम एक हिन्दू शासक ऐसा हो जो मुगल साम्राज्य से स्वतन्त्र हो। यही कारण था कि मुगल सेना के खमनोर पहुँचने के उपरांत भी तुरंत युद्ध प्रारम्भ नहीं किया। प्रताप को तैयारी का समय दिया और बाद में भी युद्ध के मैदान से उन्हें सुरक्षित निकल जाने दिया। मानसिंह की इस मानसिकता का आभास अकबर को भी हो गया। उसने मानसिंह पर नाराजगी व्यक्त करते हुए अपने प्रिय नौरत्न की डड्योढी बंद कर दी थी। इन पंक्तियों के लेखक ने 1970 में प्रकाशित एक लेख एवं अपनी पुस्तक 'प्रात: स्मरणीय: महाराणा प्रताप' में स्पष्ट लिखा है कि महाराणा प्रताप एवं मानसिंह के बीच सद्भावपूर्ण सम्बन्ध थे जिसके कारण ही प्रताप एवं मेवाड़ को हल्दीघाटी युद्ध से पूर्व व बाद में कोई विशेष नुकसान नहीं हुआ।
यह प्रसंग विशेषकर उठाया जा रहा है चूंकि मानसिंह के सम्बन्ध में जन सामान्य में अभी भी कई भ्रांतियां विद्यमान है, जबकि वास्तविकता यह है कि अगर मानसिंह अकबर के दरबार में और उसका प्रिय न होता तो शायद देश में मुस्लिम कट्टरता का तांडव नृत्य देखने को मिलता, जैसाकि स्वयं अकबर ने अपनी उपस्थिति में 1567 ई. में चित्तौड़ पर किये आक्रमण के समय किया था। बाद में उसे सही दिशा देने एवं निरंकुश नहीं होने देने में मानसिंह का विशेष योगदान रहा है जिसे हमें नहीं भूलना चाहिए।
एक और तथ्य की ओर ध्यान आकृष्ट करना समीचीन होगा कि सामरिक इतिहास के इस सबसे तेजस्वी पुरुष के काल में आम्बेर राज्य की सीमा का प्रसार तो नहीं हुआ लेकिन वैभव और शक्ति में अपार वृद्धि हुई थी। मानसिंह स्वयं एक कवि था। अत: वे एक प्रबल योद्धा होने के बावजूद कभी भी वह क्रूर नहीं हुआ। हो भी कैसे सकते थे, कवि सदैव संवदेनशील होता है। उसके अनेक स्फुट छंद मिलते हैं। उसके राज्यकाल में आम्बेर ने अनेक कवि, पंडित, गुणीजन व कालावन्त दिये और अपार साहित्य-सृजन हुआ।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि 77 युद्धों का यह नायक राजस्थान की वह विभूति है जिस पर हर राजस्थानी को गर्व का अनुभव होता है चूंकि इतिहास में ऐसा सफल समर-योद्धा युगों-युगों में होता है।

 (लेखक तेजसिंह तरुण , पुस्तक - राजस्थान के सूरमा)

 
 

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