रविवार, मार्च 11, 2018

मुलाक़ात

अचानक किसी ने ज़ीने में लगे  बिजली का स्विच ऑन किया तो छत पर दूर तक रोशनी फ़ेल गई।  किसी के आने आहट सुनकर राहुल ने पीछे पलट कर देखा तो एक युवती जिसने कमर से ट्राई कलर का दुपट्टा बांध रखा था , रस्सी से सुख चुके कपड़े उतार कर इकट्ठा कर रही थी। राहुल की तरह उसकी पीठ होने से वो उसका चेहरा नहीं देख पा रहा था । दो दिन पहले ही वह किराए के इस मकान मे रहने आया था। उसे शहर के एक अच्छे कॉलेज मे दाखिला मिल गया था।  सूर्यास्त के समय अचानक बिजली गुल होने पर राहुल गर्मी से निजात पाने ऊपर छत पर जाकर टहलने चला आया था। विशाल छत पर घूमते हुये वो अक्सर मुड़ कर लड़की का चेहरा देखने को कोशिश कर रहा था।  अचानक लड़की पलटी , उसे महसूस हुआ की कोई उसे कनखियों से देख रहा है।

नज़रें मिली.... लड़की ने घूरने वाले अंदाज से राहुल को देखा.... राहुल को लगा जैसे किसी ने उसे चोरी करते हुये पकड़ लिया हो । उसने सकपका कर नजरे फेर ली। लड़की कपड़े लेकर नीचे जा चुकी थी, साथ ही ज़ीने की बत्ती भी बंद हो गई ।  दूर पेड़ों के झुरमुटों से निकलकर चाँद छत पर चाँदनी फैलाने आ गया था ।

दूसरे दिन राहुल फिर उसी वक़्त छत पर पहुँच गया, कल के अनुभव ने उसे बैचेन कर रखा था। कपड़े आज भी सूख रहे थे। कुछ देर बाद फिर वही आहट पाकर उसने मुड़कर देखा । वही लड़की थी , उसने आज भी वही ट्राई कलर का दुपट्टा कमर से बांध रखा था ओर चुपचाप कपड़े समेट रही थी।

कुछ देर पश्चात लड़की पलटी.... नज़रें मिली …… राहुल की धड़कने बढ़ने लगी ..... मगर राहुल ने आज हिम्मत करके अपनी नज़रें नहीं हटाई । कुछ देर पश्चात ,लड़की हल्के से मुस्कराई ,कपड़े उठाए ओर सीढ़ियाँ उतरकर नीचे चली गई। राहुल भी मुस्कराकर देर तक उसके बारे मे सोचता रहा। युवा दिल ख्वाबों में काफी दूर निकल चुका था।

सिलसिला चलता रहा, लेकिन अभी तक कोई बातचीत नहीं हो पाई थी। रोज की तरह आज भी राहुल तय समय पर छत पर पहुँच गया , उसने सोच लिया था की आज उससे बातों का सिलसिला शुरू करूंगा।
आज छत पर कपड़े नहीं थे ,बस उसका ट्राई कलर का दुपट्टा सूख रहा था। राहुल इंतज़ार करने लगा । वो नहीं आई। अंधेरा हो चुका था । राहुल थक हारकर नीचे आ गया। उसने बगल वाले मकान के बंद दरवाजे की तरफ देखा जिसमे वो लड़की रहती है ।

दूसरे दिन फिर राहुल इंतज़ार करता रहा मगर वो नहीं आई , उसका दुपट्टा उड़कर अलगनी से नीचे गिर गया था ,उसने पास जाकर धड़कते दिल से दुपट्टे को उठाया ओर प्यार से वापिस अलगनी पर टांग दिया। ।
चार पाँच दिन बाद भी वो अपना दुपट्टा लेने नहीं आई तो राहुल खुद उसका दुपट्टा लेकर नीचे आया ओर बगल वाले मकान का दरवाजा खटखटाया।

एक अधेड़ सी औरत  ने दरवाजा खोला । राहुल की नज़रें घर के अंदर तक गई ओर फिर वापिस महिला के चेहरे पर टिक गई। उसने हाथ आगे बढ़ाकर दुपट्टा महिला की तरफ बढ़ाते हुये कहा ,”आंटी.... ये दुपट्टा आपकी बेटी का .... चार पाँच दिन से छत पर नीचे पड़ा हुआ था। महिला ने दुपट्टा ले लिया , वो कुछ नहीं बोली। राहुल को कोई जवाब नहीं  मिला  तो वो मुड़कर वापिस लौटने लगा।
“बेटे....”, महिला ने पीछे से पुकारा ।
“जी... जी आंटी “, राहुल ने वापिस मुड़ते हुये कहा ।
“इधर आओ...”
“जी...”
“वो तुम्हें भी दिखाई दी थी बेटे  ....?, महिला ने पूछा।
“जी... मेरा मतलब मैंने उन्हे छत से कपड़े लाते हुये देखा था तो ....सोचा वो भूल गई होंगी ,इसलिए देने आया  था”, राहुल ने हकलाते हुये सफाई दी।
“अंदर आओ बेटे”, महिला ने घर के अंदर जाते हुये कहा। राहुल पीछे पीछे ड्राइंग रूम मे सोफ़े पर बैठ गया। महिला भी साइड के सोफ़े पर  बैठ गई।
“बेटे .... ओर मेरी बेटी थी “, महिला ने उदास स्वर मे कहा ।
“थी..... मतलब ?”
“हाँ बेटे, आज से दो  साल पहले वो एक हादसे में हमें छोड़कर चली गई थी।  उसने उस दिन यही ट्राई कलर वाला दुपट्टा पहन रखा था , जिसे हमने संभाल कर उसके कमरे मे उसकी बाकी यादों के साथ सहेज कर रखा हुआ है..... ।“, महिला ने रोते हुये कहा ।
राहुल के कानों मे सीटियाँ बज रही थी, वो बोझिल कदमों से अपने मकान की तरफ बढ़ गया।
 -विक्रम





शनिवार, मार्च 03, 2018

पारो भाभी



गांवों मे रिश्तों के लिए सम्बोधन होते हैं, चूंकि हम उस वक़्त बचपन के दौर मे थे तो वहीं पारो भाभी पचपन के दौर में थी इसलिए हमें उन्हे भाभी कहने मे झिझक महसूस करते थे जिसके चलते हम लोग उन्हे “ताई” कहकर पुकारते थे । हमने सुना था की पारो ने हम लोगों को गोद मे खिलाया था। वैसे पारो का असली नाम पारो नहीं था , वो तो गाँव वालों ने पारो के गाँव के नाम पर उनका नाम रख दिया था , उनके गाँव का नाम “पार” था इसलिए उनका नाम “पारली” या पारो” पड़ गया। पारो अपने दुखों से इतनी परेशान नहीं होती थी जितना वो दूसरों की दुख की खबर सुनकर परेशान हो जाती थी ।   जैसे ही उन्हे पता चलता की गाँव मे फलां की बहू को या बेटे या बेटी को बुखार है तो पारो भाभी वहाँ उनका दुख बांटने पहुँच जाती। पारो की सहानुभूति में औपचारिकता या दिखावा लेशमात्र का भी नही होता था , सामने वाले के दुख पर उनकी  आँखों से आँसू निकलने लगते थे ।

किसी परिवार का बीमार सदस्य जब तक ठीक नहीं हो जाता पारो बराबर उनके घर जाकर खैरियत लेती रहती थी । इस बीच पारो के अपने घर का काम बाकी पड़ा रहता था।  अपनी उम्र के आखिरी दौर मे पारो भाभी खुद बीमार रहने लगी मगर बावजूद इसके वो पास-पड़ोस की खोज खबर लेती रहती ओर हिम्मत करके वो लोगों के घर पहुँचकर बीमार का हाल-चाल पूछ लेती थी। मगर एक वक़्त ऐसा आया की  उनका चलना फिरना तक मुहाल हो गया  ओर अब वो घर मे कैद हो रह गई थी । दिनभर खटिया मे पड़ी पारो भाभी  गाँव के किसी व्यक्ति के आने की राह देखती रहती ताकि उससे गाँव के हाल पूछ सके , मगर थक-हारकर अपने ही बेटे या बहू से गाँव के हाल चाल पूछने लगती । लंबी बीमारी के बाद एक दिन पारो अपने अंतिम सफर पर निकल पड़ी। गाँव के कुछ लोग औपचारिकता निभाने आ गए थे।   
(सच्ची घटना पर आधारित)



 

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