क्षत्रिय राजवंश

किसी जाति की उत्पत्ति के संदर्भ मे इस जाति के रीति रिवाज एंव परम्पराओं की सही सही जानकारी के बिना उसकी उत्पत्ति की खोज करना सत्य के नजदीक नहीं। यदि हम प्राचीन क्षत्रिय जाति के रीति रिवाज एंव परम्पराओं का अध्ययन कर वर्तमान राजपूत जाति की रीति रिवाज़ एंव परम्पराओं का अध्ययन करते हैं तो मालूम होता है की वर्तमान राजपूत जाति के वे रीति रिवाज़ एंव परम्पराएं हैं, जो प्राचीन सूर्य,चंद्र आदि के वंश की थी।

प्राचीन सूर्य एंव चंद्रवंशी राजाओं द्वारा अश्वमेघ यज्ञ करना,(राम,व युधिस्ठरके अश्वमेघ प्रसिद्ध हैं, सवाई जयसिंह जयपुर ने अश्वमेघ यज्ञ कर अपने पुरखों की परम्पराओं को निभाया) साधारण क्षत्रियों भी घुड़सवारी की परंपरा,अग्नि और शस्त्रों की पुजा करना,शिकार खेलना,ब्राह्मणों के सम्मान करना,ससुराल मे अपने पितृकुल  या जनपद के नाम पर पुकारना ( कौशल जनपद के कारण दशरथ की रानी कौशल्या और कैकय जनपद की होने से कैकयी कहलाती थी। इसी प्रकार गांधार जनपद की होने से धृतराष्ट्र की रानी गांधारी कहलाती थी। राजपूत कुलों मे भी पितृकुल पीहर के नाम से रानी का नाम पुकारा जाता था। जैसे मेड़तियों की पुत्री के लिए मेड़तनी रानी, कछवाहा राजा की पुत्री को ससुरकल मे कचवाही रानी,सोलंकी राजा की पुत्री को सोलंकणी रानी, हाडा राजा की पुत्री को हाडी रानी आदि आदि। शादी शुदा स्त्री के नाम के साथ पितृकुल की खाप का नाम ही पुकारा जाता है। किसी राठौड़ की पत्नी शेखावत खाप की हा तो वश शेखावत नाम से पुकारी जाएगी न की ससुराल की खाप के नाम से। कहने का अर्थ ये है की सूरत एंव चंद्रवंशी क्षत्रियों में जो परंपरा थी वही राजपूत कुलों मे आज भी पाई जाती है।) आदि क्षत्रियों के रीति रिवाज़ एंव परम्पराएँ सही हैं। जिनकी राजपूत जाति के रीति रिवाज़ एंव परम्पराओं से अत्यधिक समानता है। 

प्राचीन क्षत्रियों की ही भांति राजपूतों मे भी अश्वमेघ यज्ञ करना,घुड़सवारी ,शिकार खेलना,अग्नि व अस्त्रों की पुजा करना,ब्राह्मणों का सम्मान करना, पितृकुल को प्रधानता देना आदि परम्पराएँ पिछले हजारों वर्षों से यह बराबर चली आ रही है। यदि राजपूत प्राचीन आर्य क्षत्रियों की संतान न होते तो यह परम्पराएं भी इनमे न मिलती। अत: रीति रिवाज़ एंव परम्पराएं भी राजपूतों को सूर्य एंव चंद्रवंशी क्षत्रियों की संताने ही सिद्ध करती हैं।

उपाधियाँ – राजपूतों को अपने प्राचीन क्षत्रिय पूर्वजों का वंशज होने का गौरव था। अत: अनेक शासकों ने अपब्नि उपाधियाँ आदि वराह (कन्नोज के प्रतिहार राजा भोज के सिक्कों पर आदि वराह अंकित है । (हिन्दू भारत का उत्कर्ष- सी.पी वैध पृ. 367) परम भट्टारक महाराजाधिराज (चालुक्याधिपति बलधर्म राजा के ताम्रपत्र मे महेन्द्र्पाल के नाम के साथ महाराजाधिराज परमभट्टाधिराज परमभट्टारक यह वरदावली लिखी है। महेन्द्र्पाल कन्नोज का प्रतिहार सम्राट था और गुजरात का चालुक्य राजा बलधर्म उसका सामंत था।) आदि उपाधियाँ धारण की थी, यदि वे बाहर से आने वाली जातियाँ शक,कुषाण,हूणों की संताने होते तो ये उपाधियाँ धारण न करते।
राजपूतों ने अपने प्राचीन पूर्वजों की इस परम्परा का पालन आगे तक किया है । एक ही कुल के प्रधान या टिकाई ठिकाने शासक कहलाते थे और छोटे शासक राणा कहलाए। शिशोदा ठिकाने के शासक राणा थे। अल्लाद्दीन के आक्रमण के समय (ई.1303) चित्तौड़ के रावल रतन सिंह मारे गए । उसके बाद शिशोदा के राणा हम्मीर ने मुसलमानों से चित्तौड़ का किला पुन: जीता और चित्तिद का शासक हुआ तब से चित्तौड़ के नरेश राणा कहलाए।

( क्षत्रिय राजवंश – रघुनाथ सिंह कालीपहाड़ी पृ.83 )
  

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