कछवाह राजवंश

कछवाहों की उत्पति  - वर्तमान कछवाह या कुशवाहा सुयवंशी क्षत्रियों की प्रमुख खाप है । राजपूतों की इस खाप की उत्पति कहाँ से और कैसे हुई ? मान्यता की यह कुल राम के पुत्र कुश से उत्पन्न हौवा। परन्तु शोध खोज से मालूम पडता है की किसी भी प्राचीन शिलालेख या साहित्य में कछवाहा शब्द अंकित नहीं किया गया है। ग्वालियर (कच्छपघाट महिपालदेव का ग्वालियर का सास-बहू मंदिर का शिलालेख वि.स. 1150 ) दूबकुण्ड (कच्छपघाट महाराजाधिराज विक्रम सिंह का दूबकुंड शिलालेख वि.स. 1145) आदि संस्कृत शिलालेखों या दानपत्रों मे इसके लिए कच्छपघात,कच्छपा कच्छपारी आदि नाम अंकित मिलते हैं जी बारहवीं शताब्दी के हैं। इससे पूर्व किसी भी शिलालेख या साहित्य में इस खाप के लिए कुछ भी लिखित रुप से प्राप्य नहीं है । ग्वालियर ओर दूबकुंड पर शासन करने वाली इस जाति के वंशधर ही राजस्थान मे आए और दौसा तथा आमेर आदि क्षेत्र मे अधिकार कर यहाँ के शासक बन बैठे और उन्ही के वंशज कछवाहा, कछावा कहलाने लगे। इससे यह तो सिद्ध है की ग्वालियर के कच्छपघातक ही अपभ्रश राजस्थानी भाषा मे कछवाह या कछावा हुआ।
“कछवाह” शब्द का उल्लेख राजस्थान साहित्य में देखें तो 13 शती के विसलदे रासो (गोड़ चढ़या गज केशरी कचवाह कहूँ निरवाण, कोई सोलंकी वाखला कोई चावड़ा कोई चहुवाण) में मिलता है। 14 वीं शती हम्मीर महाकाव्यम कुत्सवाह शब्द का प्रयोग कछवाहों के लिए हुआ है। (सोsन्यदा प्रमदानेत्र पावने योवनश्रित। परिणेतु सुता कत्सवाहस्याssभ्रपूरीमगात: 1182 ॥ इसके बाद के साहित्य मे प्रर्थ्वीराज रासो  (13 वीं शती से 16 वीं शती) क्यामखाँ रासो (1691 वि. कछवाहिनजब यां कहयो ऐसों कौन मूछारर, जो इन पटीयन माहीं ते हमको देत निकार॥767॥ कयामखाँ रासो पृ.65) नैणसी री ख्यात (रामचन्द्र रा लव नै कुस हुया,....कुस रा कछवाहा हुआ (नैणसी री ख्यात भाग 1 पृ.293)
कछवाहों की खापें निम्न है।
देलणोत ,झामावत ,घेलणोत , राल्णोत ,जीवलपोता ,आलणोत (जोगी कछवाहा) , प्रधान कछवाहा , सावंतपोता, खीवाँवात , बिकसीपोता,पीलावत ,भोजराजपोता (राधर का,बीकापोता ,गढ़ के कछवाहा,सावतसीपोता) ,सोमेश्वरपोता,खींवराज पोता, दशरथपोता,बधवाड़ा,जसरापोता, हम्मीरदे का , भाखरोत, सरवनपोता,नपावत,तुग्या कछवाहा, सुजावत कछवाहा, मेहपाणी , उग्रावत , सीधादे कछवाहा, कुंभाणी , बनवीरपोता,हरजी का कछवाहा,वीरमपोता, मेंगलपोता, कुंभावत, भीमपोता या नरवर के कछवाहा, पिचयानोत , खंगारोत,सुल्तानोत, चतुर्भुज, बलभद्रपोत, प्रताप पोता, नाथावत, बाघावत, देवकरणोत , कल्याणोत, रामसिंहहोत, साईंदासोत, रूप सिंहसोत, पूर्णमलोत , बाकावत , राजावत, जगन्नाथोत, सल्देहीपोता, सादुलपोता, सुंदरदासोत , नरुका, मेलका, शेखावत, करणावत , मोकावत , भिलावत, जितावत, बिझाणी, सांगणी, शिवब्रह्मपोता , पीथलपोता, पातलपोता।

कच्छावा राजपूतो की शाखाएँ :-
राजावत , शेखावत , भाखरोत , नरुका , खंगारोत , नाथावत , बांकावत , रकवाल , सोतियाना , नांदवांक , अलगावत , पचाणोत , बलभद्रोत , सोमेसरा , सिंहाणी , जोगा कछावा , धीरावत , अलांहणोत , कंभाणी , पीथलपोता , वनवीरपोता , विरमपोता , कुमावत , नदावत , रामचन्द्रोत , गोगावत , करणावत , साईंवासोत , सुरताणोत , बालापोता , पूर्णमलोत , जेतलपोता , कातावत , सूजेपोता , पातळपोता , आदि ...............
Source- क्षेत्रीय राजवंश (लेखक रघुनाथ सिंह कालीपहाड़ी राज।)

1 टिप्पणी:

  1. Mahendra Singh agrawal Mandha1 अगस्त 2016 को 3:11 pm

    बहुत अच्छी जानकारी है। कच्छावा वंश की गोतो की जानकारी कम ही मिलती है।

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