झाला जालिम सिंह

जिन सपूतों के कृत्य से राजस्थान का मस्तक ऊंचा हुआ है ,उनमे राजस्थान के उतरकालीन युग मे जन्मे झाला जालिम सिंह का कूटनीतिक क्षेत्र मे अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है । विधि की विडम्बना है की जालिम सिंह अंधे थे, किन्तु अनेक बार उनके चातुर्य के आगे लोगों को विश्वास भी नहीं होता था की ऐसा बुद्धिमान व्यक्ति भी अंधा हो सकता है। समकालीन इतिहासकार टौड को पहली भेंट मे कई वर्ष बाद उनके अंधेपन की बात मालूम हुई थी।
नांता के एक साधारण जगीरदार के रूप मे जालिम सिंह ने कोटा के दरबार मे प्रवेश किया और फिर वो फौजदार, दीवान,न्यायधीश ,सेनाध्यक्ष ओर कोषाध्यक्ष के रूप मे निखरे। अंत मे वही जालिम सिंह कोटा राज्य के सर्वेसर्वा व झालावाड़ राज्य के संस्थापक बने।
झाला जालिम सिंह से पहले कोटा राज्य की स्थिति अत्यंत विकट थी। चारों और अराजकता और मराठों का भय से उत्पन्न से आतंक का बोलबाला था। राज्य मे सब स्थितियां  अत्यंत जटिल और कठिन थी, परंतु जालिम सिंह ने राज्य की नौका को सागर के किसी भँवर मे नहीं फंसने दिया। झाला जालिम सिंह से सर्वप्रथम जयपुर के विरुद्ध भटवाड़े नामक स्थान पर लड़े गए युद्ध मे कोटा को विजयश्री दिलवाई। यहीं  ने उनकी प्रसिद्धि कोटा की सीमाओं को लांघ गई। उन्होने अपनी बहन का विवाह कोटा के तत्कालीन नरेश गुमान सिंह जी के साथ करवाकर कोटा राज्य के अन्य सरदारों मे अपना सर्वोच्च स्थान बना लिया, इससे कोटा के अन्य सरदारों मे ईर्ष्या का श्रोत फूट पड़ा और शीघ्र ही झूठे कान भरे जाने लगे। क्कुच ही समय मे जालिम सिंह को निर्वासित कर दिया गई और साथ ही उसकी नानते की जागीर भी छीन ली गई। जालिम सिंह कोटा से उदयपुर आए। उस समय उदयपुर के महाराणा अरीसिंह की स्थिति भी डांवाडोल थी। महाराणा ने जालिम सिंह के बारे मे सुन रखा था उनके आने से उनकी हिम्मत बंधी।
उदयपुर आने पर जालिम सिंह का स्वागत किया गया और उन्हे राजराणा का खिताब तथा चीताखेड़ा देकर सम्मानित किया गया। जालिम सिंह जब तं मेवाड़ मे रहे , राणा को मराठों से अपने कूटनीतिक चातुर्य द्वारा बचते रहे और उधर कोटा राज्य की हालत दिन-प्रतिदिन बिगड़ने लगी। अत: महाराजा गुमान सिंह ने जालिम सिंह को दुबारा बुला लिया।
शीघ्र ही वह फिर से कोटा के प्रतिष्ठित सरदार बन गए। लेकिन जालिम सिंह जानते थे की गुमान सिंह के रहते हुये कोटा राज्य की हालत नहीं सुधार सकती तो टौड आदि विद्वानों के अनुसार उन्होने वैध से मिलकर गुमान सिंह को मरवा दिया। ये कलंक राज्य के जगीरदार स्वरूप सिंह के माथे मढ़ दिया। बाद मे स्वरूप सिंह को भी एक षड्यंत्र के तहत मरवा दिया  और स्वय सर्वेसर्वा बन गया। रावराजा गुमान सिंह की मौत के बाद उनका 10 वर्षीय बेटा उम्मेद सिंह गद्दी पर बैठा, जिसके सरक्षण का भार जालिम सिंह के कंधो पर था।
जालिम सिंह के कूटनीतिक षडयंत्रों से तंग होकर हाड़ा सरदार राज्य छोड़ छोड़ कर जाने लगे तो जालिम सिंह ने तुरंत पड़ौसी राज्यों को पत्र लिखकर सूचित कर दिया की ये सब बागी और अविश्वसनीय हैं। जालिम सिंह की बात सबको माननी पड़ी।
इस से ये प्रमाणित हो जाता है की झाला जालिम सिंह इस समय तक राजपूताने का एक महान कूटनीतिज्ञ और प्रमुख व्यक्ति बन चुका था। उसने कभी महाराजा को नाराज किया तो कभी मरहठों से दोस्ती की तो कभी अंग्रेजों को बुलाया। जालिम सिंह ने कोटा मे रहते हुये जयपुर पर किए आक्रमण के समय मरहठों से दोस्ती की , फिर मरहठों से कोटा को बचाने के लिए अंग्रेजों से हाथ मिलाया और जब हारने लगा तो तुरंत मरहठा (होल्कर) को खुश करने मे लग गया। होल्कर जालिम सिंह की चालबाजियों को समझता था मगर वो उस से संबंध बिगाड़ना नहीं चाहता था। कभी कभी जब मरहठों का उत्पात अधोक होता तो जालिम सिंह पिंडारियों को भड़का देता। पिंडारियों का आतंक उस समय पूरे राजस्थान और मध्य भारत की सीमाओं पर बहुत छाया हुआ था। उस समय पिंडारियों का सरदार अमीर खाँ था।
अमीर खाँ की पत्नी को धर्म बहन बनाकर उसने पिंडारियों का शक्ति का भी अपने हित मे खूब उपयोग किया।
ऐसा ही जालिम सिंह ने मेवाड़ के साथ किया । सिंधिया उन दिनों मेवाड़ को परेशान कर रहा था । जालिम सिंह ने सिंधियाँ के विरोध मेवाड़ को सैनिक सहायता भी दी और बाद मे राणा और सिंधियाँ के बीच दोस्ती कारवाई। एक समय जब मेवाड़ मे पठानों का विद्रोह हो रहा था , तब जालिम सिंह ने दबाने मे सहायता देकर राणा के साथ संबंध सुदृढ़ बनाए।
न केवल मेवाड़ तक उसने कूटनीतिक प्रभाव की सीमा थी बल्कि बूंदी जिसका कोटा के साथ वैमन्सय काफी समय से चला आ रहा था, को भी प्रभाव मे लिया। इसके लिए जालिम सिंह ने हर संभव कोशिश की और सवंत 1839 ई मे दोनों को मित्रता के बंधन मे बांधा।
अत: यह कहने मे संकोच नहीं की जालिम सिंह अपने समय का महान कूटनीतिज्ञ था जिसका लोहा मेवाड़ के महाराणा , मरहठे , अंग्रेज़ पिंडारी एवम राजस्थान के सभी देशी शासक मानते थे।  
Source- राजस्थान के सुरमा - पृ 139 (लेखक तेज सिंह तरुण)

1 टिप्पणी:

  1. प्रिय तेज सिंह तरुण इस लेख से कई नए तथ्यों का पता चला जिसके लिए आप का बहुत बहुत धन्यवाद.

    आप ने इस लेख का आरम्भ इस पंक्ति से किया है: "जिन सपूतों के कृत्य से राजस्थान का मस्तक ऊंचा हुआ है,उनमे राजस्थान के उतरकालीन युग मे जन्मे झाला जालिम सिंह का कूटनीतिक क्षेत्र मे अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है ।"

    निम्नलिखित जानकारी - जो इस लेख मैं आगे आप ने दी है - उससे इनके लिए उपरोक्त शब्दों ("जिन सपूतों के कृत्य से राजस्थान का मस्तक ऊंचा हुआ है ,उनमे राजस्थान के उतरकालीन युग मे जन्मे झाला जालिम सिंह का कूटनीतिक क्षेत्र मे अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है ।") का प्रयोग मेरी तुच्छ बुद्धि वाले दिमाग को समझ नहीं आया, कियोंकि आगे आप ने बताया है: "नांता के एक साधारण जगीरदार के रूप मे जालिम सिंह ने कोटा के दरबार मे प्रवेश किया और फिर वो फौजदार, दीवान,न्यायधीश ,सेनाध्यक्ष ओर कोषाध्यक्ष के रूप मे निखरे। ........... उन्होने अपनी बहन का विवाह कोटा के तत्कालीन नरेश गुमान सिंह जी के साथ करवाकर कोटा राज्य के अन्य सरदारों मे अपना सर्वोच्च स्थान बना लिया ............ जालिम सिंह जानते थे की गुमान सिंह के रहते हुये कोटा राज्य की हालत नहीं सुधार सकती तो टौड आदि विद्वानों के अनुसार उन्होने वैध से मिलकर गुमान सिंह को मरवा दिया। ये कलंक राज्य के जगीरदार स्वरूप सिंह के माथे मढ़ दिया। बाद मे स्वरूप सिंह को भी एक षड्यंत्र के तहत मरवा दिया और स्वय सर्वेसर्वा बन गया।"

    आपके लेख से तो जान पड़ता है कि यह महाशय बहुत भारी चालबाज़ और मौक़ापरस्त थे जिन्होंने अपनी महत्वकांशा की पूर्ती हेतू अपनी सगी बहिन का इस्तेमाल करने से भी संकोच नहीं किया और उसके पति (जिससे उन्होंने खुद अपनी बहिन का विवाह करवाया था और जो उसके मौके के मालिक थे) को मारने के समय अपनी बहिन के हित-अहित की भी चिंता नहीं की. यह कोई ऐसे सपूत नहीं जान पड़ते जिनके कृत्यों से राजस्थान का गौरव बड़ा हो.

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